भोपाल। कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं तो उनके साथ उनकी आवाज़, उनके क़दमों की आहट और उनके लफ़्ज़ भी ख़ामोश हो जाते हैं लेकिन कुछ लोग दुनिया से जाते नहीं, वो दुनिया के अंदर उतर जाते हैं। लोगों की सोच में, उनके सवालों में, उनके हौसलों में और उनके इंकार में। डॉ. राहत इंदौरी उसी दूसरी क़िस्म के इंसान थे। वो मिट्टी में नहीं उतरे बल्कि ज़हनों में बस गए।
उनकी आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है, उनका लहजा आज भी सवाल करता है और उनकी शायरी आज भी डरती नहीं है। राहत साहब ने कभी महफ़िल के हिसाब से शेर नहीं पढ़े, उन्होंने वक़्त के हिसाब से बात की।
इंदौर की गलियों, चौराहों और दिलों में ही नहीं बल्कि दुनिया में जहाँ भी उर्दू बोली और सुनी जाती है, वहाँ आज भी राहत साहब ज़िंदा हैं। कभी किसी शेर की शक्ल में, कभी किसी नारे की तरह और कभी किसी नौजवान की बेबाक ज़ुबान पर।
‘राहत की बात’ असल में किसी एक शाम या किसी एक मंच का नाम नहीं है। यह उस जुर्रत का नाम है जो राहत साहब की पहचान थी। यह उस बेबाकी का नाम है जो उन्होंने शायरी को दी और यह उस एहसास का नाम है जिसे उन्होंने अपने बाद भी मरने नहीं दिया।
आज के दौर में जहाँ शायरी भी एक महफ़ूज़ खेल बनती जा रही है, जहाँ लफ़्ज़ बोलने से पहले तराज़ू पर तौले जाते हैं और सच को मुलायम काग़ज़ में लपेटकर पेश किया जाता है, वहाँ राहत साहब की याद एक चेतावनी नहीं बल्कि एक ज़रूरी दख़ल की तरह सामने आती है।
वो याद दिलाते हैं कि शेर महज़ ताली बजवाने का हथकंडा नहीं होता, वो सजावट की भी कोई चीज़ नहीं होता बल्कि शेर आईना होता है और वक़्त से किया गया बेबाक सवाल भी।
राहत साहब ने शायरी को किताबों से निकालकर आम आदमी की सांसों में रख दिया। उन्होंने सिखाया कि लफ़्ज़ अगर सच्चे हों तो माइक की ऊँचाई मायने नहीं रखती और अगर बात दिल से निकली हो तो वो दिल तक पहुँच ही जाती है।
‘राहत की बात’ दरअसल उस रूह को ज़िंदा रखने की एक कोशिश है जिसने शायरी को सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं दिए बल्कि जसारत दी। यह एक याद है जो बताती है कि राहत साहब को महज़ किताबों में बंद नहीं किया जा सकता क्यूंकि वो सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते बल्कि हर उस जगह महसूस किए जाते हैं जहाँ सच बोलने की ज़रूरत पड़ती है।
आज जब हम उन्हें याद करते हैं तो सिर्फ़ उनका माज़ी नहीं दोहराते। हम अपने आज को कसौटी पर रखते हैं, उसे थोड़ा और मज़बूत बनाते हैं। हम अपने लफ़्ज़ों को आईना दिखाते हैं और ख़ुद से सवाल करते हैं कि क्या हम भी सच बोलने का वही हौसला रखते हैं जो राहत साहब ने हमें सिखाया था क्योंकि राहत साहब का जाना, किसी एक शायर का जाना नहीं था बल्कि वो एक पूरे दौर का जाना था और ‘राहत की बात’ दरअसल उसी दौर को फिर से ज़िंदा करने की एक संजीदा कोशिश है।
राहत सिर्फ़ एक नाम नहीं थे। राहत एक आवाज़ थे और आवाज़ें अगर बेबाक हों, ज़मीर से निकली हों और सच का बोझ उठाने का हौसला रखती हों तो वो कभी ख़ामोश नहीं होतीं। वो वक़्त से टकराती हैं, हर दौर को अपना पता देती हैं और ज़हनों में गूंजती रहती हैं।
‘राहत की बात’ दरअसल उसी गूंज की एक कड़ी है जो बताती है कि राहत साहब आज भी हमारे बीच हैं, अपने लफ़्ज़ों में, अपने असर में और हमारी ज़ुबान पर।
पहली जनवरी की शाम, राहत के नाम
डॉ. राहत इंदौरी की विरासत को संजोने के लिए ‘राहत इंदौरी फाउंडेशन’ नए साल की पहली किरण के साथ एक बार फिर अदबी रवायतों का परचम लहराने जा रहा है। डॉ. राहत इंदौरी की 76 वीं जयंती के उपलक्ष्य में फाउंडेशन द्वारा लगातार छठे वर्ष भव्य अखिल भारतीय मुशायरा एवं कवि सम्मेलन ‘राहत की बात’ का आयोजन किया जा रहा है। 1 जनवरी की शाम, आनंद मोहन माथुर ऑडिटोरियम देश के नामचीन रचनाकारों की आवाज से गुंजायमान होगा। इस महफ़िल में सम्पत सरल (जयपुर), व्यंग्य की धार से व्यवस्था पर प्रहार करेंगे। शकील आज़मी (मुंबई), सलीम सिद्दीकी (बाराबंकी) व खुर्शीद हैदर (मुजफ्फरनगर), आदिल राशिद (नई दिल्ली), डॉ. संदीप शर्मा (धार) शब्दों के शिल्पी, पूर्व पुलिस अधिकारी महेंद्र सिंह सिकरवार (इंदौर), तबरेज़ मुनव्वर राना (लखनऊ), अनवर कमाल (मधुबनी) व रिजवान मलिक (नई दिल्ली) की शायरी पेश करेंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कव्वाल रईस अनीस साबरी अपनी टीम के साथ डॉ. राहत इंदौरी की कालजयी शायरी को सूफियाना रंग में रंगकर एक रूहानी समां बांधेगे।
‘राहत की बात’ ; एक नाम नहीं, एक दौर, आयोजन नए साल की पहली शाम

