बताओ तो साहब, तलब किए गए थे या सफाई देने गए थे…

पटियेबाजी

अब लोग कह रहे, कम से कम अपने ओहदे का तो मान रखा होता…

भारत भूषण विश्वकर्मा
7400794801

कहीं थोकबंद मौतों पर भी आंकड़ों में न उलझने की बातें तो कहीं मरने वालों के प्रति दुःख जताने के जतन… कभी “जो हुआ सो हुआ” जैसे मुहावरे भी बड़बोले होने के सबूत के साथ सुनाई दे गए तो कहीं से खुद को ईमानदार दिखाने की कोशिशें ही पत्रकारों को धौंस देती दिखाई पड़ीं… वो चेहरा जिसे कभी मजाकिया जुमलों और हंसी का पर्याय बताया जाता था, आज तंग सुरक्षा घेरे में महफूज़ लेकिन गंभीर ही नजर आया… इंदौर में प्रशासनिक नाकामी के चलते घटी घटना पर सबके अपने तर्क हैं, लेकिन खुद के बचाव में… एक वरिष्ठ पत्रकार को मिले अश्लील जवाब पर जो प्रतिक्रिया सामने आई वह भी सबने देखी है, और अपने आका को मुश्किलों से राहत देने वाले सवाल भी सभी ने सुने हैं… सवालिया तीरों की बारिश में जवाबी ढाल से लैस सियासी जिम्मेदारों की असल कलई भी पूरी तरह खुल चुकी है… अधिकारी हमारी नहीं सुनते जैसे उद्गार उन श्री मुखों से झर रहे हैं जो जरा सी बात पर भी बतंगड़ बनाने में माहिर हैं… लेकिन ये भी ठीक ही हुआ जो सूबे की आवाम को भी आज समझ आया कि, पूरी ऐंठ में शीशे बंद गाड़ियों में रौब गांठने वाले हमारे भाईसाब को निम्न स्तर के कर्मचारी भी गंभीरता से नहीं लेते… इस प्रकरण में लगातार फ्रंट लाइन पर खेलने वाले बड़े साहब का लेटेस्ट डिफेंस अब जनता के बीच कानाफूसी का विषय बन चुका है… कभी राहत टैंकरों के पानी चखकर लोगों में भरोसा जगाने वाले बड़े साहब फिलवक्त किसी बड़े दबाव में दिख रहे हैं… लोगों में उत्सुकता यह जानने की है कि बड़े साहब दरबार में सफाई देने गए थे या उन्हें भी दरबार में तलब किया जाने लगा है… हालांकि वजह जो भी हो बड़े साहब का दरबारी बनना न सिर्फ जनता बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का भी नुकसान है… लेकिन अपन कर भी क्या सकते हैं, न तो बड़े साहब पर अपना जोर है और न ही दरबार से भिड़ने लायक सामर्थ्य है… मौजूदा सरकार में जमे लोगों और भाजपा की राजनीति करने वालों का दरबार जाना सुहाता है, लेकिन आम आदमी और नियमों के प्रति जिम्मेदार बड़े साहब का ऐसा करना हज़म नहीं हो रहा… दरबारी बनने की असल वजह जो भी रही हों लेकिन कानाफूसी में माहिर लोगों को नया मसाला मिल गया है, जिसमें लोग अपने अपने स्वाद से तड़का लगा रहे हैं…

खैर सियासी लोगों की तो अपनी दुनिया होती है, हो सकता है बड़े साहब भी उसी चमक दमक के प्रभाव में हों…

08-01-2026

पुलिस महानिदेशक  कैलाश मकवाणा का पत्रकारों से आत्मीय संवाद…

पुलिस–पत्रकार नव वर्ष मिलन समारोह संपन्न

जीतेन्द्र सेन
भोपाल:- पुलिस और मीडिया के बीच आपसी समन्वय को और अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से पुलिस महानिदेशक  कैलाश मकवाणा के मार्गदर्शन में “पुलिस एवं पत्रकार नव वर्ष मिलन समारोह – 2026” का आयोजन गुरुबार को पुलिस ऑफिसर्स मेस, भोपाल में किया गया। कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया संस्थानों से जुड़े वरिष्ठ एवं युवा पत्रकारों के साथ-साथ पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तथा जनसंपर्क विभाग के अधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
समारोह के दौरान पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा ने उपस्थित पत्रकारों एवं अधिकारियों से आत्मीय भेंट कर सभी को नव वर्ष 2026 की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने पत्रकारों से वन-टू-वन संवाद किया और मीडिया तथा पुलिस के बीच बेहतर समन्वय, सूचनाओं के जिम्मेदाराना संप्रेषण तथा जनहित से जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा की।

संवाद के दौरान पुलिस महानिदेशक ने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और पुलिस तथा मीडिया के बीच पारस्परिक विश्वास, पारदर्शिता एवं सकारात्मक सहयोग समाज में सकारात्मक संदेश देता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में भी पुलिस और मीडिया मिलकर जनहित, कानून व्यवस्था और सामाजिक जागरूकता के लिए कार्य करते रहेंगे।
नव वर्ष मिलन समारोह का मुख्य उद्देश्य पुलिस एवं मीडिया के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को मजबूती देना, संवाद को प्रोत्साहित करना तथा आपसी सहभागिता को बढ़ावा देना रहा। कार्यक्रम सौहार्द, गरिमा और सकारात्मक वातावरण में संपन्न हुआ, जिसमें पुलिस और मीडिया के सहयोग की भावना स्पष्ट रूप से देखने को मिली!

दुनिया में अमन हो, सबकी भलाई के फैसले हों, हर शख्स रहे खुशहाल…

देश, दुनिया, प्रदेश की तरक्की की दुआओं के साथ इज़्तिमा का समापन

आखिरी दिन उठे दुआ के लिए लाखों हाथ
• अल्लाह के रास्ते निकलीं सैकड़ों जमातें
• फटाफट कचरा सफाचट, खटाखट यातायात भी क्लियर

इज़्तिमागाह से खान आशु
ए अल्लाह, हम गुनाहगार हैं, खतावार हैं, तेरे हुक्म से गाफिल हैं, तेरी राह से भटके हुए हैं, तेरे नाफरमान हैं… लेकिन जो हैं, जैसे हैं तेरे बंदे हैं, तेरी किताब के कायल हैं, तेरे पैगंबर की सीरत को मानने वाले हैं….! ए अल्लाह हम सभी पर रहम फरमा दे….!
पिछले तीन दिनों से ईंटखेड़ी में चल रहे 78वें आलमी तबलीगी इज्तिमा का समापन सोमवार सुबह इन दुआओं के साथ हुआ। मौलाना सआद कांधालवी साहब ने यह दुआ कराई। दुआ ए खास के दौरान मौलाना ने पहले अरबी में दुआ की। इसके बाद मौजूद मजमे को जोड़ते हुए उर्दू में भी दुआओं का निजाम चला।
आयोजन स्थल से लेकर तीन किमी तक सड़क खेत और घरों में बैठे लोगों ने आमीन कहा। दुआ ए खास में शिरकत के लिए बड़ी तादाद में लोगों ने रात से ही इज्तिमागाह पहुंचना शुरू कर दिया था। कुछ लोगों ने अल सुबह इज्तिमागाह का रुख किया। सुबह से दुआ के लिए दौड़ ने शहर की अधिकांश सड़कों को वाहनों से भर दिया। हर शख्स इस मजमा ए खास में शामिल होने के लिए उतावला दिखाई दे रहा था। जिस दौरान मौलाना सआद साहब दुआ कर रहे थे, सारा मजमा पिन ड्रॉप साइलेंट की मुद्रा में दिखाई दे रहा था। दूर दूर तक सिर्फ मौलाना की आवाज गूंज रही थी और बीच बीच में लोगों की आमीन की आवाज़ें इसमें शामिल हो रही थीं।

तय वक्त पर हुई दुआ
आलमी तबलीगी इज्तिमा के आखिरी दिन सोमवार को सुबह 10.30 बजे दुआ ए खास होने का ऐलान किया गया था। इस लिहाज से लोगों का इज्तिमागाह पहुंचने का सिलसिला भी अल सुबह से शुरू हो गया था।  मौलाना सआद साहब ने अपना बयान पूरा करने के बाद दुआ ए खास की शुरुआत की। मजमे में मौजूद करीब 13 लाख से भी ज्यादा लोगों दुआ के साथ आमीन की सदाएं गुंजायमान की। खामोशी के दुआ ए खास और आमीन का सिलसिला करीब 30 मिनट तक जारी रहा। सुबह करीब 10.24 बजे शुरू हुई दुआ करीब 10.54 बजे तक चला। दुआ पूरी होने के बाद भोपाल मरकज के इकबाल हफीज ने जमातियों को वापसी का शेड्यूल समझाया।

शुरू हुआ रवानगी का सिलसिला
दुआ के बाद लोगों की रवानगी का सिलसिला शुरू हो गया। यहां से कुछ लोग अपने घरों को लौटे तो कुछ दीन सीखने के मकसद से चार माह और चालीस दिन की जमातों में निकले। 14 नवंबर को हुई  शुरूआत के बाद सोमवार को इस मजहबी समागम का समापन हुआ। जिसमें करीब 13 लाख लोगों ने शिरकत की।

71 पार्किंग में वाहन, ट्रैफिक इंतजाम में हजारों लोग
चार दिन के आलमी तब्लीगी इज्तिमा में 13 लाख से ज्यादा लोग पहुंचे। हजारों वाहन थे। इज्तिमा स्थल ईटखेड़ी पहुंचने के रास्ते भी सीमित। बावजूद इसके न तो कहीं जाम लगा और न ही कहीं यातायात रुका। इन इंतजामों में लगे पुलिस, प्रशासन के अधिकारियों के साथ हजारों वॉलेन्टियर्स की कई दिनों की मेहनत के चलते ये आसान हो पाया। इज्तिमा के समापन के बाद रास्तेभर वॉलेन्टियर्स ने यातायात इंतजाम संभाले रखा। गोलखेड़ी से होकर कई गांवों को लांघते हुए अचारपुरा बायपास तक आने वाले मार्ग की व्यवस्था हिन्दू भाइयों ने संभाल रखी थी। इनमें एक पूर्व सरपंच भी शामिल थे।

चला तकरीरों का दौर
चार दिन के इस आयोजन में देशभर से उलेमाओं की तकरीर हुई। सोमवार सुबह फजिर की नमाज के बाद की तकरीर में फिर से उन बातों को दोहराया गया। सुबह फजिर की नमाज के बाद बयान किया गया। इनके बाद तबलीग की मुख्य 6 बातों की तालीम दी गई। दुआ ए खास से पहले मौलाना सआद साहब ने जमात में निकलने वालों को खास ताकीद देते हुए बयान किया। चार दिन चलीं इन मजलिसों में उलेमा बोले अल्लाह की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता। ये अकीदा तोड़ने से खराब हालात होंगे। नेक राह जो बताई गई है, उस पर चलने वाले बनो तो तुम्हारी हर परेशानी खत्म हो जाएगी। आपसी रिश्ते बेहतर रखने और सबके काम आने की हिदायत भी मजमे को दी गई।

सबका शुक्रिया, सबका आभार
आलमी तब्लीगी इज्तिमा के दौरान सहयोग करने वाले सभी लोगों और संस्थाओं का इज्तिमा इंतेजामिया कमेटी ने आभार जताया। जिला प्रशासन, पुलिस, नगर निगम, पीएचई, विद्युत विभाग, रेलवे, स्वास्थ्य विभाग के सभी जमीनी कर्मचारियों व आला अधिकारियों का शुक्रिया अदा किया।

झलकियां
• आलमी तबलीगी इज्तिमा के पूरा होने पर होने वाली दुआ ए खास में शामिल होने लोगों ने अल सुबह से दौड़ लगा दी थी।
आमतौर पर ईद और बकरीद पर इतनी सुबह साफ सुथरे कपड़े, खुशबू लगाए और सिर पर टोपी सजाए मुस्लिम धर्मावलंबी सड़कों पर दिखाई देते हैं।
• आलमी तबलीगी इज्तिमा इस कड़ी का तीसरा आयोजन कहा जा सकता है।
• इज्तिमागाह के आसपास स्थित खानपान दुकानों में नारायण नाश्ता हाउस और सहाय फूड कॉर्नर पर भी ग्राहकों की खासी भीड़ दिखाई दी।
• इज्तिमा परिसर में अनिल केतली में चाय लिए घूम घूम कर लोगों की खिदमत कर रहा था। जबकि सुरेश ने यहां मीठे लच्छे बेचता दिखा।
• वापसी सफर के दौरान लोगों ने सड़क किनारे अस्थाई दुकानों से किसानों द्वारा बेची जा रही अमरूद, मूली, संतरे, मैथी आदि की जमकर खरीदी की।
• दुआ ए खास के बाद पहले पैदल मुसाफिरों को निकाला गया। उसके बाद दो पहिया वाहन, फिर चार पहिया निकाले गए। बड़े माल वाहकों को सबसे आखिर में।
• वापसी के समय लोगों का हुजूम इज़्तिमागाह से बायपास, गांधी नगर, करोंद और काजी कैंप के अलावा bmhrc और मंडी होते हुए छोला की तरफ रहा।
• इज़्तिमागाह आने जाने वाले मार्ग पर हर तरफ टोपियां ही टोपियां दिखाई दे रही थीं।

वादे पे तेरे मारा गया…!

चकरघिन्नी. कॉम
खान आशु

वादा.. और वह भी सियासी वादा… सियासत में चुनाव के दौरान किया गया वादा…! वादे तो ही तोड़ने के लिए हैं, यह लोगों की आम धारणा है…!
और चुनावी वादों का क्या, वह तो मंच से लहराते ही हैं, टूटने के लिए हैं…!
लेकिन इच्छाशक्ति… दृढ़ संकल्प… और कुछ कर गुजरने का सच्चा मन…! इसीलिए 29 माह गुजर गए, वादा अडिग रहा, खुशियां बरकरार रहीं, बहनों की मुस्कान लगातार रही…! तनिक देरी से बवाल खड़ा कर देने वाले विरोधियों के मुंह दही जमने के हालात बनते रहे…!
रक्षा बंधन के पवित्र पर्व का सिलसिला इस दीपावली की खुशियों में अधिक मिठास घोले हुए हैं…! एक हज़ार का सिलसिला, 1250 पर पहुंचकर आनंदित करता रहा है… अब 1500 की रकम के साथ प्रफुल्लित करने लगा है…!
बहनों के आत्मविश्वास, बढ़ते संबल और हम भी समाज में भागीदारी रखते हैं के दम को ही सशक्तिकरण कहना गैर मुनासिब नहीं होगा…! अपने छोटे छोटे खर्चों के लिए, बच्चों की छोटी आवश्यकता के लिए और कई बार परिवारिक कार्यों में मदद के हाथ जुटाने लायक बनाने जैसी नारी शक्ति बन गई है…!
स्थानीय, नगरीय और छोटी सियासत से अब विधानसभा और लोकसभा तक में प्रतिनिधत्व का दम भी उन्हें मिला है…! सरकारी दफ्तरों से निजी निकाय तक कल कारखानों तक में बहनों की संख्या तय हो गई है तो प्रदेश और केंद्र के सदन में उनका मुकाम जल्दी ही तय होने वाला है…!
प्रदेश की आधी आबादी पर मुस्कान लाने के प्रयास पिछले उन वर्षों में भी होना संभव था, जब बागडोर महिलाओं के प्रति असंवेदनशील, अगंभीर, गैर ईमानदार लोगों के हाथ हुआ करती थी…! ग़म इसका मनाने की बजाए कि अब तक ऐसा क्यों नहीं हुआ, गर्व इसका मनाया जाना चाहिए कि महिलाशक्तिकरण की नई पहल हो चुकी है, जो सतत जारी रहेगी…!

पुछल्ला
एकता पाठ का सार
राजा उनके घर जा पहुंचे जिनसे उनकी पुरानी खुन्नस मानी जाती है। इस युवा(?) नेता की बुजुर्ग बुआ जी से राजा जी के पंगे थे। लेकिन राजकुंवर का रास्ता साफ करना है। आने वाले वक्त में सत्ता की चाबी राजकुमार को सौंपने की उमंग ने एकता पाठ की आवश्यकता को सामने खड़ा कर दिया है। इसलिए शुरुआत गैरों से की जा रही है, अपनों के साथ देने की उम्मीद बंधी ही है न!
=============
*12/10/2025*

दवा कंपनियों की लापरवाही उस पर भारी अज्ञानता

पड़ताल : क्योंकि, सच जानना जरूरी है

राजस्थान और मध्य प्रदेश में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। मामले के तूल पकड़ते ही अब सरकार और दवा कंपनी कटघरे में आ गई है।
हालांकि, दवा ही ज़हर बन गई, यह बात इतनी आसानी से गले नहीं उतर रही, लिहाजा इस मामले की पड़ताल जरूरी थी ताकि सच के करीब पहुंचा जा सके। जो हमने जाना-समझा उसकी चर्चा से पहले हम दवा कंपनियों की लापरवाही पर आते हैं। कफ सिरप ही क्यों?, ऐसी कोई भी दवा जो गुणवत्ताहीन है, दूषित है या एक्सपायरी है वह मार्केट तक पहुंची कैसे? जाहिर है सरकारीतंत्र से मिलीभगत और कालाबाजारी ने ऐसी दवाओं को बाज़ार तक पहुंचाया जो बच्चों की मौत का कारण बनीं। यहां इस बात का जिक्र करना भी लाजिमी है कि ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा और पाया गया है कि, गिफ्ट, कमीशन और नगद उपहार के लालच में आकर कतिपय डॉक्टर्स दवा कंपनियों के ऑफर को स्वीकार कर ऐसी दवाएं लिख देते हैं, जो जरूरी नहीं होतीं।

दवाओं में एडवाइजरी क्यों नहीं?
अब दूसरा पहलू यह भी है कि, 2 साल और पांच साल के बच्चों को दवा पिलाने को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जो एडवाइजरी इस घटना के बाद जारी की है, वह पहले से दवा कंपनियों के लिए जरूरी क्यों नहीं की गई। अगर दो साल से कम उम्र के बच्चों को कफ सिरप नहीं पिलाना चाहिए तो यह बात कफ सिरप की बोतल में लिखी होनी चाहिए थी।( कम से कम उस डॉ को तो यह बात पता होनी चाहिए थी, जिसने दवा लिखी।) अब इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है? सवाल यह भी है कि महज डॉक्टर पर कार्यवाही कर इस संगीन अपराध से सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती, संबंधित दवा कंपनी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। यह दर्शाता है कि सरकार और दवा कंपनी के बीच “कुछ” तो है। खैर, “कुछ” हो ना हो आम जनमानस में यही भाव जागेगा।

अज्ञानता भी एक बड़ी वजह
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के परासिया तहसील में कफ सिरप पीने से जिन बच्चों की मौत हुई, हमारी पड़ताल में व्यक्तिगत तौर पर की गई लापरवाही भी सामने आई है। ( मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इस पड़ताल से सरकार और दवा कंपनी की घोर लापरवाही पर पर्दा डालने का कतई मकसद नहीं है।) “व्यक्तिगत लापरवाही” को हम यूं समझें कि, जागरूकता की कमी या ना समझी। कमोवेश यह घटनाएं जहां जहां हुईं, वहां दवा देने की टाइमिंग और डोज को लेकर अज्ञानता भी देखी गई। 2 साल या उससे कम उम्र के बच्चों को कितनी मात्रा में और कब कब दवा पिलानी है यह जानकारी भी पेरेंट्स को होनी चाहिए। कई बार ज्यादा खांसी चलने पर घबराहट में माता-पिता बच्चों को दवा की ओवरडोज दे देते हैं ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएं ,लेकिन ऐसा करना जानलेवा होता है। हमारी पड़ताल में यह बात भी निकल कर सामने आई है। (लेकिन हम इसी को एकमात्र कारण मान लें यह भी जरूरी नहीं।) दरअसल कफ सिरप किडनी और हार्ट को प्रभावित करता है और यदि यह ओवरडोज बच्चों को दे दी जाए तो यह कितना घातक हो सकता है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। इसीलिए बच्चों को डॉक्टर की निगरानी में ही दवाएं देनी चाहिए।
पड़ताल का दूसरा पहलू यह भी गौर करने लायक है कि, बीमार बच्चों के मामले में कफ सिरप के साथ-साथ दूसरी अन्य मेडिसिन भी दी गईं, (बुखार और सर्दी जुकाम से संबंधित) जिसका नॉलेज भी पेरेंट्स को होना चाहिए। यह पता होना चाहिए कि दवाओं का मिश्रित रूप स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है।
बहरहाल, दूषित दवा, अज्ञानता या व्यक्तिगत लापरवाही हम किसी निष्कर्ष या नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। बच्चों की मौत का मामला बेहद दुखद, मार्मिक और संगीन है, इसकी पूरी निष्पक्षता से जांच होनी चाहिए और ऐसी दवाओं पर भी रोक लगनी चाहिए ताकि भविष्य में और जिंदगियां मौत के मुंह में जाने से बच जाएं।
(लेखक जितेंद्र सूर्यवंशी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

गुनाह उनका भी कम नहीं, सज़ा उनके लिए तय क्यों नहीं…?

चकरघिन्नी.कॉम
खान आशु

नेता जी बड़े ताव में हैं.. इनके गुनाह गिनाते नहीं थक रहे… मौका मिला तो पिछले एक शख़्स को भी घसीट रहे हैं… पावन मौकों पर भी पतित कामों को गिनाने से नहीं चूक रहे…! भाववेश में यह भूल जाते हैं कि जिस मगरमच्छ ने मछलियों को पोषित होने में सहयोग किया, वह भी उनके साथ का ही है…! कर्म से भी, और धर्म से भी…! जब नेस्तनाबूद करने का हलक उठाते हैं, तो इस गुनहगार को क्यों भुला दिया जाता है…!
याद यह यह भी रखा जाना चाहिए कि मछली की गिरफ्त से न कौम गमजदा है न अफसोस में… क्योंकि ब्लैक मेलिंग से नशे तक, क्लब से लेकर मछली के ठेके तक में इनकी कोई भागीदारी नहीं थी..! किसी को क़ौम की तरफ ले जाने की बात इसलिए गले नहीं उतारी जा सकती है कि गुनाहगारों के खुद कौम के होने में संशय बना हुआ है…! वे अगर क़ौम की बताई राह पर होते तो यहां तक कतई नहीं पहुंचते, जहां पहुंच गए हैं…!
बात सज़ा की है, तो गुनाह- गुनाह बराबर तोले जाना चाहिए..! मेरा-पराया मानकर किसी को छोड़ा जाना भी गुनाह- ए-अज़ीम माना जाना चाहिए…!
सिर्फ बोलने के लिए बोलना आसान है…! तराज़ू के पलड़े पर अपने मेंढक तोलना मुश्किल…! बकौल फिल्म दीवार, श्री अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग… जाओ पहले उस आदमी का साइन लाओ, जिसने मुझे इस बुराई के दलदल में धकेल दिया था… जाओ पहले उस आदमी का साइन लाओ, जिसने मेरे हाथ पर लिख चोर दिया था…!
बात फैसले की ही आ गई है तो चोरी करने वाला भी चोरी… चोरी के लिए उकसाने वाला भी चोर…! तो फिर किसी सज़ा में भेदभाव क्यों…?

पुछल्ला
दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया
कभी साथ था। कारोबार की बात थी। यहां से वहां तक हमकदम थे। दो हंसों के जोड़े की तरह साथ ही दाना चुगते थे। अब हालात बदल गए हैं। साथी बिछड़ गए हैं। एक पद पर पग जमवाने के इरादे भी छिटक गए हैं। साहब ने दूसरे साहब से नाता यहां तक तोड़ लिया है कि साथ दिखने में भी किसी आफत का खौफ है। लेकिन पिछले साल को कैसे झुठलाएं, यह समझ नहीं आ रहा।
25/अगस्त/2025

आप बाबागिरी ही क्यों नहीं करते…?

चकरघिन्नी कॉम
खान आशु

कभी पर्ची निकालकर तो कभी हजारों रुपए कीमत की जैकेट पहनकर चर्चा में बने रहने वाले स्वयंभू बाबा…! एक धर्म विशेष का महंगा गांव बसा कर करोड़ी बनने का ख्वाब देखने वाले बाबा..! पीएम को अपने प्रोग्राम में बुलाकर प्रदेश के अगुआओं पर नकेल कसने वाले बाबा..! पीएम के सामने गृहस्थ हो जाने और उन्हें इस मंगल कार्य में शामिल होने की दावत देने वाले बाबा…!
अपनी बाबागिरी से ज्यादा विवादित बयानों को उन्होंने धंधा बना रखा है…! या यूं कहें कि किसी को खुश करने के लिए किसी की नाराज़गी का ठेका ले रखा है…! जब मुंह खोलते हैं, गंदगी टपकाना आदत हो गई है…!
अब बोले हैं तो होली, दिवाली से लेकर कावड़ियों तक को लपेटा है…! इन्हें जानकारी नहीं है शायद, इन त्योहारों का विरोध करने वाले वही हैं, जो इनसे जुड़े हुए हैं…!
हज, रोजा, जकात पर विरोध जताने की बात कह रहे हैं..! अजान और नमाज से तो ऐतराज पहले ही हैं…!
कोई इनसे पूछेगा कि हज, रोजा, जकात में किसी को क्या दिक्कत है, किसकी भावनाएं आहत हो रही हैं और किसका कुछ खर्च हो रहा है…! साहेब के दोस्त की एयरलाइंस को फायदा मिल रहा है, पैसा रोटेट हो रहा है और बाजार ही गर्म हो रहा है…!
अगर कोई काम हाथ में लिया है और उसे धन उगाही का साधन बनाया है, तो उसी को ईमानदारी से कर लो…! किसी मजहब के आधारभूत नियमों पर टीका टिप्पणी करने का हम आपको किसने है…? न तो कोई इसके लिए योग्य है और न ही किसी को इसका अधिकार है…! संख्या बल कम दर्शा कर हमेशा कम बताने की कोशिशों के बीच यह कहना छोड़ दिया जाना चाहिए कि… तुम खतरे में हो…! अगर खतरा है तो किससे, क्यों, कैसे, कब और कितना, यह भी बताते चलो…!

पुछल्ला
ये हिदायत काम आएगी
नवनियुक्त अध्यक्ष। पहली बात। पहली समझाइश। तरीके से रहोगे, फायदे में रहोगे। गांठ बांध ली जाना चाहिए।
=================
02/जुलाई/2025

देखो दीवानों तुम ये काम न करो…!

चकरघिन्नी
खान आशु
संतों, महंतों, काल, महाकाल, मंदिरों और श्रद्धालुओं की नगरी… सियासत, आध्यात्म और सबकी मिली जुली विरासत की नगरी… सड़कों पर बिखरी आस्था… आस्था के बीच छुपी खुराफात… हालात पहले भी बने थे, फिर बनाए गए…!
सड़कों पर निकला सैलाब… आस्था में डूबे लोग…! जिनके लिए आस्था है, उनके साथ दूसरों का सम्मान भी सभी का नैतिक दायित्व है…! लेकिन आस्था में लिपटी चरण पादुकाएं किसी दूसरे मजहब पर उछाली जाना किस धर्म में सिखाई जा रही है, इसका ख्याल किया जाना चाहिए…! इस एक हरकत के असरात कहां से कहां तक आ सकते हैं इस बात का ख्याल भी रखने की जरूरत है…!
मुखिया और कानून व्यवस्था संभालने के जिम्मेदार के शहर में हादसा होकर खामोशियों में दब जाता है…! नफरती चिंटू मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं… ठीक वैसे ही मुस्कुरा रहे हैं, जैसे किसी पर थूकने का इल्ज़ाम लगा कर खुश हुए थे…! झूठ की बिना पर हुई कार्यवाही की तत्परता और चीख चीख कर बयां हो रहे सच की खामोशी से अंदाज लगाया जा सकता है कि बेइमानी मन में समा गई है या किसी पर कार्यवाही करने का खौफ समाया हुआ है…!
खामोश वह भी बैठे हैं, जिनके जिम्मे क़ौम ने खुद को कर रखा है… डर है कि कुछ कहेंगे तो राज गद्दी से बेदखल कर दिए जाएंगे..!

पुछल्ला
स्वयंभू न्यायाधीश(?)
प्यार, मुहब्बत, इश्क़। न रुका है, न रुकेगा। इसने जात देखी, न रुतबा, न उम्र। सजा देने के चौधरी वह कैसे बन गए, जिन्हें खुद के घर में कहने का कोई हक नहीं। न्याय प्रिय पुलिस भी अब कार्यवाही उसके खिलाफ कर रही है, जिसने प्यार किया है। नफरत फैलाने वाले पुलिस के सहयोगी बनकर बैठे हैं।
29/जून/2025

इसकी सजा ज़रूर मिलेगी…!

चकरघिन्नी.कॉम
खान आशु

आदत बरसों की… न बदली है, न बदल पाएगी… सब एक बराबर, न कोई छोटा, न बड़ा…! करने पर आए तो साहेब के वाहन को भी निशाना बना डाला…! एक नहीं, दो नहीं, पूरे नौ वाहन…! सबमें नकली माल…! दिक्कत यह है कि असली हो तो डाला जाए…! जो था, वह परोस दिया…! पता इसलिए चल गया कि वाहन में साहेब खुद साक्षात मौजूद थे…! परेशान भी हुए और लेट भी…! मालिक ए पंप को सजा मिली, सील कर दिए गए…! यह सजा तो हुई साहेब के परेशान होने की, जो बरसों से परेशान हो रहे हैं, इस पंप से ठगा रहे हैं, पानी का मोल पेट्रोल जितना दाम चुका रहे हैं, उनका क्या…? और उनका क्या जो पूरे प्रदेश में इसी तरह लूटे जा रहे हैं…?
नियम, कायदा, कानून, व्यवस्था बने तो सबके लिए बनना चाहिए, किसी बड़े और अहम इंसान के ठगने, लुटाने का इंतजार क्यों…? राजधानी भोपाल हो या प्रदेश के किसी कोने में बसा गांव, सब जगह पंप पर पेट्रोल पूरा और गुणवत्ता वाला मिल जाए तो लेने वाले की किस्मत…! वरना चोरी और मिलावट की मिकदार तो यह है कि बिना वेतन पंप पर सेवाएं देने के लिए लोग तैयार बैठे हैं..!

पुछल्ला
नफरत की जीत
राजधानी के एक कॉलेज की प्राचार्या इन दिनों चर्चा में हैं। वजह नफरत का प्रसार करने में इनकी अगुवाई। किसी धार्मिक क्रिया से इन्हें दिक्कत है। शाबाशी देने के लिए सियासत, सत्ता, प्रशासन और नफरती चिंटू तैयार बैठे हैं।
27/जून/2025

अपना भोपाल : तालाब, पहाड़ियों, सुंदर वादियों, मस्जिदों और तहजीब, तालीम का शहर

जो बात इस जगह, वह कहीं पर नहीं…

 

भोपाल। तहज़ीब, तालीम, तरक्क़ी और तासीर का शहर दुआ है कि गंगा-जमुनी तहज़ीब को कभी कोई बुरी नज़र न लगे और इसकी खूबसूरती बनी रहे 

 ताहिर अली

यदि मंदिरों से घंटियों की मधुर आवाज़ और मस्जिदों से बुलंद अज़ान एक साथ गूंजे, तो समझ लीजिए आप उस शहर में हैं, जहाँ सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब ने अपने खूबसूरत रंग बिखेरे हैं। यह शहर है भोपाल – झीलों की नगरी, नवाबी संस्कृति की परछाईं, प्राकृतिक सौंदर्य की मिसाल और ऐतिहासिक धरोहरों का सजीव संग्रह।

तहज़ीब और भाईचारा

भोपाल की सबसे बड़ी खासियत इसकी साझा संस्कृति है। यहाँ तालाब के बीचों-बीच मंदिर, मस्जिद और मजारों का साथ-साथ दिखना आम बात है। यही वह शहर है, जहाँ सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक – ताजुल मस्जिद है, तो वहीं विश्व की सबसे छोटी मस्जिद मानी जाने वाली ‘ढाई सीढ़ी मस्जिद’ भी यहीं स्थित है। भोपाल में उर्दू भाषा का उपयोग लगभग सभी समुदाय के लोग करते हैं।

भोपाल की सड़कों पर चलते हुए अगर कोई राहगीर किसी मोहल्ले का पता पूछ ले, तो भोपाली उसे दरवाजे तक छोड़कर आते हैं। यही इसकी तहज़ीब है, यही इसकी पहचान है। भोपाल की एक बात ओर मशहूर है कि जो भी भोपाल आता है यहां के लोग उसे सीने से लगा लेते हैं। हिन्दुस्तान के किसी भी कोने से जो भोपाल आया जैसे नौकरीपेशा या कोई भी व्यवसाय के लिए यहीं का होकर रह गया। भेल कारखाना इसका जीता-जागता उदाहरण है। ज्यादातर नौकरी पेशा अधिकारी एवं कर्मचारी रिटायर होने के बाद भोपाल को ही अपना मानकर यहीं बस गए। काफी लोग कारोबार करने के उद्देश्य से यहीं आकर आबाद हो गये।

भोपाल की मज़ेदार ‘उर्फ़ियत’ – नाम के पीछे नाम की दुनिया!

भोपाल, भोपाली और भोपालियत की पहचान केवल ताल-ता‍लैया और ऐतिहासिक इमारतों आबोहवा, तहजीब और संस्‍क़ति तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी अनोखी और मज़ेदार ‘उर्फ़ियतों’ के लिए भी मशहूर है। जब किसी मोहल्ले में एक ही नाम के कई लोग हों, तो पहचान बनाने के लिए नाम के पीछे कुछ जोड़ना लाज़मी हो जाता है, फिर चाहे वो पहनावे से जुड़ा हो, बोलचाल से, शौक से या किसी मज़ेदार किस्से से – हर भोपाली को मिल जाता है उसका ख़ास “उर्फ़ी टाइटल”।

तो मिलिए भोपाल की इस अनोखी नामावली से –

तारिक़ टाई, जो हमेशा टाई में दिखते थे, तारिक़ चपटे, जिनके गाल खुद गवाही देते हैं, तारिक़ होंठ कटे, जिनके होंठों की कहानी हर गली जानती है, और तारिक़ झबरे, जिनकी आंखें ही उनकी पहचान हैं। आरिफ़ अंडे का नाश्ता शहर भर में मशहूर है, तो आरिफ़ बुलबुल अपने गले से सबको दीवाना बना देते हैं। बाबूलाल 501 नाम की सिगरेट की तरह मशहूर हैं, और सेठ छगनलाल, जिनका “सेठपना” मोहल्ले में आज भी कायम है।

रविंद्र सिंह लखरत, बाबूलाल लठमार, चांदमल हिटलर, मोहन पंचायती, लाला मुल्कराज, सरदारमल लालवानी, नाहर सिंह सूरमा भोपाली, कन्हैयालाल ‘बीड़ी’ और के. अमीनउद्दीन-301 तो अपनी शान और रसूख़ के लिए पहचाने जाते हैं। अखिलेश अग्रवाल गफूरे और वहीद अग्रवाल की उर्फ़ियतें उनकी दोस्ती और कारोबार की दास्तान सुनाती हैं। हफ़ीज़ पाजामे और चांद कटोरे का नाम सुनते ही भोपाल मुस्कुरा उठता है, वहीं चांद चुड़वे मोहल्ले की कहानियों के नायक हैं। सुरेश 501, अनिल अग्रवाल पटीये, और देवेश सिमहल वकील साहब अपने नाम से ही काफ़ी असरदार हैं। बाबू साहब घोड़े और बाबू साहब नाम की सादगी में गजब की शान है। आलू बड़े, ज़ायकों की दुनिया के हीरो हैं, और लोक सिंह ताल ठोंकू हर बहस में जीत की गारंटी हैं। रईस भूरा, मुन्ने मॉडल ग्राउंड, मुन्ने पेंटर, मुईन क़द्दे और माहिर मदीना – ये नाम जैसे ही कान में पड़ें, पूरा मोहल्ला मुस्करा उठता है।

भोपाल की गलियों में लोग नाम से कम और उर्फ़ियत से ज़्यादा जाने जाते हैं। जावेद चपटे और जावेद चिराटे जैसे नामों में मज़ाकिया तंज है, तो बन्ने पहलवान और बन्ने लखेरा में मोहल्ले की दो अलग-अलग शख्सियतें झलकती हैं। कल्लू अट्ठे, बाबू भड़भुजे, मुन्ने फुक्की, ईरानी और डूंड जैसे नाम रोज़मर्रा की आदतों, मज़ाक या पेशे से जुड़े हैं। सईद बुल, छुटकटे, वहीद ढेलकी, आरिफ पिस्स, और अनफिट भोपाल की उस खास तासीर को दर्शाते हैं, जहां हर नाम के पीछे एक किस्सा है — हँसी, अपनापन और तंज से भरा। यही भोपाल की असली पहचान है — उर्फ़ियतों में बसी यारी और यादें।

भोपाल की इन मज़ेदार उर्फ़ियतों में वो अपनापन है, जो किसी GPS में नहीं मिलता – सिर्फ मोहल्लों की यादों और बातों में ही जिंदा रहता है।

भोपाल में हिंदू-मुस्लिम एकता : सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की मिसाल

भोपाल की सांस्कृतिक विरासत की सबसे मजबूत कड़ी उसकी हिंदू-मुस्लिम एकता है, जो सिर्फ सामाजिक सौहार्द का प्रतीक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संघर्षों के बीच पनपी सहिष्णुता और साझेदारी की अनूठी मिसाल है। जब देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया, तब भी भोपाल ने अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को संजोए रखा। हर वर्ग के लोगों ने एक दूसरे से बहुत प्यार मोहब्बत के साथ दिली लगाव रखा। सन 1812 की लड़ाई में हिंदू योद्धाओं जैसे डांगर सिंह, जय सिंह, और अमन सिंह पटेल ने भोपाल की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां तक कि युद्ध में महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी की, यह दिखाते हुए कि भाईचारा केवल धार्मिक स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के स्तर पर भी जीवित था।

भोपाल रियासत के प्रशासन में हर कालखंड में हिंदुओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। दीवान (प्रधानमंत्री) जैसे उच्च पदों पर लाला घानी राम, लाला फूलानाथ, राजा अवध नारायण जैसे हिंदू अधिकारी रहे। यह समावेशिता केवल औपचारिक नहीं थी — ये अधिकारी नवाबों के विश्वासपात्र भी थे। नवाब क़ुदसिया बेग़म के दरबार में एक हिंदू, एक मुसलमान और एक ईसाई मंत्री नियुक्त थे — यह उस समय की धार्मिक विविधता के प्रति सम्मान का प्रतीक था।

रियासत के इंजिमाम (शामिल करने) के बाद शरीफ़ शरणार्थियों में (उच्च परिवार के शरणार्थी) सरदार गुरबख्श सिंह भी थे, जिनके बेटे अमरीक सिंह रंजीत होटल चलाते हैं। वे बहू मियाँ के साथ ईद पर नवाब साहब को सलाम करने जाते। एक बार नवाब साहब ने पूछा कि भोपाल कैसा लग रहा है, तो सरदार साहब ने हाथ जोड़कर कहा कि जहाँ गरीब परवर सरकार का साया हो, वहाँ कोई कैसे न खुश हो — यह कहते हुए वे भावुक हो गए।

धार्मिक सहिष्णुता के उदाहरण

नवाबों ने हिंदू नागरिकों और जागीरदारों के अधिकारों को बराबरी से सम्मान दिया। नवाब सुल्तान जहां बेग़म ने रंग पंचमी पर रंग और सावन के झूले जैसे हिंदू पर्वों में भाग लिया, और गरीब हिंदुओं के लिए “सदाव्रत” योजना शुरू की, जिसमें उन्हें भोजन और यात्राओं के लिए सामग्री दी जाती थी। हवा महल की दीवार इसलिए टेढ़ी बनाई गई क्योंकि पास के एक हिंदू नागरिक ने अपनी जमीन बेचने से इनकार किया था — सरकार ने उस निर्णय का सम्मान किया।

भोपाल में न कभी विशुद्ध मुस्लिम मोहल्ले रहे, न विशुद्ध हिंदू — सब एक साथ रहते थे। त्योहार, शादियाँ, दुःख-सुख सब साझे होते थे। इसी समरसता ने उर्दू भाषा के विकास को सहज वातावरण दिया। उर्दू न केवल दरबार की भाषा बनी, बल्कि आम जीवन की भाषा भी, जिसमें दोनों समुदायों ने योगदान दिया। भोपाल का इतिहास केवल एक रियासत की कहानी नहीं, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द, धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक सहभागिता का जीवंत दस्तावेज़ है। यह आज के भारत के लिए भी एक प्रेरणा है कि विभिन्न धार्मिक समुदाय कैसे सम्मान, सहयोग और साझा विरासत के आधार पर एक सशक्त समाज का निर्माण कर सकते हैं।

दिनों के नाम पर मोहल्लों के नाम

भोपाल की दिलचस्प रचनात्मकता इसके मोहल्लों के नामों में भी झलकती है – मंगलवारा, बुधवारा, इतवारा, जुमेराती, पीरगेट – इन मोहल्लों में किसी एक समुदाय की पहचान नहीं बल्कि पूरे शहर की साझी संस्कृति की झलक मिलती है। यही कारण है कि यहाँ के लोग आपदाओं में एक-दूसरे की मदद के लिए सबसे पहले खड़े नजर आते हैं।

शुजा ख़ां का अट्टा भोपाल की उन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गलियों में से एक है, जिसकी मिट्टी ने कई नामचीन और असरदार शख़्सियतों को जन्म दिया है। यूँ तो रियासत भोपाल में जुमेराती के काका मियाँ, इब्राहीमपुरा के तब्बू मियाँ और शफ़ीक़ पठान, लक्ष्मी टॉकीज़ के रफ़्फ़ू पहलवान, बुधवारा के डॉक्टर ज़हीरुलइस्लाम, इमामी गेट के हकीम अख़्तर आलम और सर्राफा चौक के मुन्नू लाल जोहरी जैसे कई मशहूर लोग गुज़रे हैं, मगर शुजा ख़ां का अट्टा की अपनी एक अलग ही तारीख़ है। यहाँ की सरज़मीन न केवल ज़रख़ेज़ रही है, बल्कि इसने समाज, अदब और कारोबार के कई सितारों को भी रौशन किया है। समय के साथ यह इलाका अब एक बड़ा कारोबारी केंद्र बन चुका है, जिसकी वजह से पुराने बाशिंदों के कई ख़ानदान सुकून की तलाश में शहर के अलग-अलग वीआईपी इलाकों में जाकर बस गए हैं। लेकिन इस मोहल्ले की रौनक कभी ज़हूर हाश्मी, शिक्षाविद डॉ. सैय्यद अशफ़ाक अली, खान शाकिर अली खान, शायर अख़्तर सईद ख़ां, नवाब मियाँ ‘सिगरेट’, मौलाना इमरान ख़ां, अल्लामा खालिद अंसारी, शर्की खालिदी और सालिक भोपाली जैसे रौशन चहरों से जगमगाया करती थी।

भोपाल का गुटका, बटुआ और नवाबी बटुए

एक ज़माना था जब भोपाल के गुटके की खासियत हर जगह मशहूर थी। ये वो गुटका नहीं, जो आज की तरह लोगों की जेब में रहता है, बल्कि ड्रायफ्रूट, रंग-बिरंगे मसालों और इत्र की सुगंध से तैयार होता था, जिसे खूबसूरत बटुओं में सजाकर पेश किया जाता था। भोपाल के ‘बटुए’ नवाबी शान की निशानी थे, और आज भी सर्राफा बाजार की कुछ दुकानों पर यह परंपरा जीवित है।

भाईचारे की कहानियाँ – रिश्तों की गर्मी

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां किसी एक विशेष समुदाय के मोहल्ले नहीं बल्कि सारे समुदाय समझदारी, भाईचारा और आपसी प्रेम के साथ एक साथ रहते हैं। किसी आपदा-विपदा में एक-दूसरे की मदद करते नजर आते हैं। मैं खुद भोपाल के इतवारा मोहल्ले का निवासी रहा हूँ। हमारे पुश्तैनी मकान के सामने साहू समाज का परिवार रहता था, जो आज भी हमारे दिल के बेहद करीब है। मेरी बहन ने इस परिवार को राखी बाँधी थी। मेरी बारात में ये परिवार हमारे साथ सीहोर तक गया, और जब 1977 में मेरी माताजी का निधन हुआ, तो पहली रसोई इन्हीं के घर से आई। आज भी हमारे सुख-दुख में वही आत्मीयता बरकरार है।

भोपाल: धर्मनिरपेक्ष पहचान का प्रतीक

भोपाल के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक, काली माता का मंदिर, छोटे तालाब क्षेत्र में स्थित है और एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है। वहीं एयरपोर्ट क्षेत्र में स्थित मनुआभान की टेकरी पर श्वेतांबर जैन समुदाय का एक प्रसिद्ध मंदिर है। अब इस टेकरी को महावीर गिरी के नाम से भी जाना जाने लगा है, जहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। बिड़ला मंदिर भोपाल का श्रद्धा का केंद्र है। चौक स्थित प्राचीन आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, बहुत मशहूर है। इसके साथ ही बिडला मंदिर सहित अनेक मंदिर आस्‍था के केन्‍द्र है।

भोपाल में सिख धर्म की उपस्थिति सुदीर्घ और प्रभावशाली रही है, जिसका प्रतीक हैं शहर के तीन प्रमुख ऐतिहासिक गुरुद्वारे – शाजहानाबाद, हमीदिया रोड और इदगाह हिल्स। शाजहानाबाद स्थित गुरुद्वारा नानकसर 19वीं सदी में स्थापित हुआ और आज भी गुरबाणी, संगत और लंगर की परंपराओं को जीवंत रखे हुए है। हमीदिया रोड का गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा शहर का प्रमुख धार्मिक व सामाजिक केंद्र है, जहाँ कीर्तन, शिक्षण शिविर और सामूहिक सेवाएं नियमित रूप से होती हैं। वहीं इदगाह हिल्स स्थित गुरुद्वारा गुरु नानक दरबार आध्यात्मिक शांति व प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल है, जहाँ पर्वों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं। ये तीनों गुरुद्वारे न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि सेवा, एकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की मिसाल भी पेश करते हैं।

भोपाल की सबसे पुरानी चर्चें शहर के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण हैं। सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी कैथेड्रल चर्च 150 वर्षों से अधिक पुराना है और नवाब सिकंदरजहां बेगम की अनुमति से ब्रिटिश काल में बना। इसकी वास्तुकला और शांति इसे प्रार्थना का प्रिय स्थल बनाते हैं। सेंट जोसेफ कैथोलिक चर्च एक शांत वातावरण वाला यह चर्च, भोपाल की सबसे पुरानी पूजा स्थलों में से है, जो सामुदायिक कार्यक्रमों और त्योहारों में सक्रिय भूमिका निभाता है। इन्फेंट जीसस चर्च की सुंदर वेदी और क्रिसमस के अवसर पर भव्य सजावट इसे विशेष बनाती है। यह धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। इन चर्चों की उपस्थिति भोपाल की सर्वधर्म समभाव की परंपरा को और मज़बूत बनाती है।

नवाबों की विरासत: ताजमहल से लेकर बाबे-ए-आली तक

भोपाल के ताज महल की इमारत, जिसे नवाब हमिदुल्ला खान ने पाकिस्तान से आए सिंधी शरणार्थियों को शरण देने के लिए समर्पित किया था, आज भी सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। भोपाल शहर के बीचों-बीच स्थित जामा मस्जिद हिंदू-मुस्लिम एकता की परिचायक है। गोलघर, गौहर महल, मिंटो हॉल, सदर मंजिल और बॉबे आली जैसी शानदार इमारतें अपनी खूबसूरती और भाईचारे की गवाह हैं। भोपाल में किसी जमाने में खवातीन (महिलाओं) के लिए घरेलू सामान की जबरदस्त प्रदर्शनी बाबे-ए-आली में लगा करती थीं। जिसमें शहर के बड़े ताजिर (व्यापारी) अपनी दुकानें प्रदर्शनी में लगाया करते थे। प्रदर्शनी में 10 साल से ज्यादा के पुरूषों को आने की अनुमति नहीं थीं। भोपाल के नबाव होली त्योहार के बाद रंगपंचमीं पर शहरवासियों के साथ मिलकर रंग खेलते थे। उस जमाने में शादियां मोहल्ले में शामीयाने लगा कर की जाती थी। भोपाल की पहचान उस दौर में खास सवारी तांगा से हुआ करती थी। शादी समारोह में शामिल होने आए मेहमानों का तांगा सवारी का किराया खुद अदा करते थे।

बरकतउल्ला भोपाली: आज़ादी की अलख जगाने वाला अज़ीम सपूत

भोपाल की सरज़मीं को यह फ़ख्र हासिल है कि यहाँ एक ऐसा जांबाज़ स्वतंत्रता सेनानी पैदा हुआ, जिसने अपनी पूरी जिंदगी भारत की आज़ादी के नाम कर दी। मौलाना मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली — एक ऐसा नाम, जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ज्वाला बनकर उभरा। कच्चे मकान में जन्मे इस अज़ीम शख्स ने दुनिया के 26 देशों में 45 सालों तक भटकते हुए स्वतंत्रता की मशाल को जलाए रखा। 1890 में जब वो इंग्लैंड पहुंचे, तो देखा कि एक ही साम्राज्य में एक देश (इंग्लैंड) सम्पन्न और दूसरा (भारत) बदहाल क्यों है? इस अन्याय के खिलाफ उन्होंने कलम और जुबान को हथियार बनाया। पेरिस में ‘अल-इंक़लाब’ के संपादक बने, जापान में ‘इस्लामिक फ्रेटरनिटी’ नामक अखबार शुरू किया, जर्मनी में लाला हरदयाल के साथ ‘ग़दर पार्टी’ की नींव रखी और अमेरिका में जाकर भारतीयों को एकजुट किया।

1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने रूस में क्रांतिकारी लेनिन से मुलाकात की, और गांधीजी के मार्गदर्शन में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के साथ मिलकर अफगानिस्तान में निर्वासित भारत सरकार की स्थापना की। इसमें बरकतउल्ला भोपाली को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। उनके नाम पर भोपाल में आज ‘बरकतउल्ला विश्वविद्यालय’ और ‘बरकतउल्ला भवन’ स्थापित हैं।

शायरों, हाकी खिलाड़ियों और पूर्व राष्ट्रपति की धरती

भोपाल ने देश को न केवल नामचीन शायर और लेखक दिए, बल्कि हॉकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। खपोटा लकड़ी से बनी हॉकी स्टिक लेकर इस शहर के खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया। यही भोपाल है जिसने डॉ. शंकर दयाल शर्मा को राष्ट्रपति पद तक पहुँचाया – यह हर भोपाली के लिए गर्व की बात है।

भोपाल का जिक्र करेंगे तो ओबेदुल्ला खां हाकी गोल्ड कप का उल्लेख होना भी जरूरी है, नहीं तो यह अधूरा माना जाएगा। ये टूर्नामेंट भोपाल में एक जश्न की तरह मनाया जाता था। भोपाली पूरे साल इस का इन्तेजार करते थे। हिदुस्तान के अलावा इन्टरनेशनल टीमें में भी इस टूर्नामेंट में भाग लेती थी। साइकिलों का दौर था हर साइकल सवार ऐशबाग स्टेडियम की तरफ नजर आता था।

यह जानना भी ज़रूरी है कि रियासत भोपाल की बेगम सुल्तान जहां के बेटे प्रिंस औबेदुल्ला ख़ान के नाम पर इस टूर्नामेंट की शुरुआत 1931-32 में हुई थी। यह भारत में हॉकी का सबसे पुराना हॉकी टूर्नामेंट माना जाता है। उस दौर में अकेले भोपाल में ही 65 हॉकी क्लब थे। वहीं रायसेन जिले का कस्बा ‘औबेदुल्लागंज’ भी प्रिंस औबेदुल्ला के नाम पर ही रखा गया है। एक ज़माने में भोपाल को ‘हॉकी की नर्सरी’ कहा जाता था।

भोपाल-नंबरों का शहर

वक्त के साथ भोपाल शहर बढ़ता गया, नई बसाहटों के नए-नए नाम आये। विस्तारित हुए शहर भोपाल के इलाकों की शिनाख्त नंबरों से भी होती है। सबसे पहले आता है 1250, मतलब जिला अस्पताल जयप्रकाश चिकित्सालय, जिसे ज्यादातर लोग 1250 या जेपी अस्पताल कहते हैं। अस्पताल का नामकरण इस इलाके में बने 1250 सरकारी आवासों से है। आवास और अस्पताल दोनों 1250 के नाम से जाने जाते हैं। करीब ही सेकेंड है, यानी कभी यहां सिटी बस को दो नंबर स्टॉपेज हुआ करता है। हालांकि, इलाके का असली नाम तुलसीनगर है। सेकंड से आगे बढ़े तो मालूम नहीं क्यों तीन व चार ग़ायब हैं और सीधे पांच नंबर इलाका और पांच नंबर मार्केट। असलियत में ये शिवाजी नगर इलाके का हिस्सा है। पांच के बाद छह नंबर भी शिवाजी नगर का ही हिस्सा है। इतना ही नहीं मिनी बस वालों और यात्रियों की सहूलियत के लिये छह नंबर और सात नंबर स्टॉप के बीच सवा छह और साढ़े छह भी हैं। इन इलाकों में रहने वाले खुद के पते के बारे में यही बताते हैं। सात नंबर के बाद आठ नंबर स्टॉप को आठ नंबर कम रविशंकर मार्केट के नाम से ही जाना जाता है। यहां के वाणिज्यिक इलाके को नौ नंबर के नाम से जाना जाता है। आगे 10 और 11 नंबर के बीच साढ़े 10 नंबर भी पता बन चुका है। इसके बाद 11 नंबर और उससे बायीं तरफ 1100 आ गया। यहां भी इलाके की पहचान 1100 सरकारी क्वार्टर्स की वजह से है। वापस बस स्टॉप की रवायत में आएं तो 11 नंबर से आगे बढ़े तो 12 नंबर, और इसी लिये भोपाल के नए शहर के पीडब्ल्युडी दफ्तर के भवन को 12 नंबर दफ्तर के नाम से जाना जाता है। नंबरों वाला होने में शहर के सबसे ज्यादा पॉश इलाके भी पीछे नहीं हैं। चार इमली, 74 बंगले और 45 बंगले हैं। जहां संतरी से मंत्री तक और बाबू से सबसे बड़े बाबू (आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अफसर) के साथ ही राज्य शासन के दूसरे अफसर रहते हैं। चार इमली के बारे में शहर के बुज़ुर्ग बताते हैं कि जब भोपाल राजधानी नहीं था तब यहां घना जंगल था और इमली के चार बड़े पेड़ थे। पैंतालीस और चौहत्तर बंगले भी बंगलों की संख्या के कारण बने। अब शहर का प्रसार निरंतर हो रहा है। नित-नए इलाके प्रकट हो रहे हैं। अब भोपाल शहर पूंछ की तरफ बढ़ रहा है। पूंछ में शामिल हो रहे हैं होशंगाबाद रोड एनएच-12 के दोनों तरफ के आर्केड, पैलेस, विला, विहार और पुरम। नई कॉलोनियों की बसाहट भोजपुर की ओर जाने वाले मोड़ तक पहुंच गई है। भोपाल की लंबी होती पूंछ की फिलवक्त लंबाई मील में है, लिहाजा इसे 11 मील कहते हैं।

आधुनिक भोपाल की ओर: स्मार्ट सिटी की उड़ान

वर्तमान में भोपाल एक स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित हो रहा है। ओवरब्रिज, स्मार्ट रोड, मेट्रो रेल जैसे प्रोजेक्ट्स पुराने शहर को नए शहर से जोड़ रहे हैं। एयरपोर्ट अब भी विशेष सेवाओं के लिए कार्यरत है और पुराने दौर की ‘पुतली घर’ नामक कपड़ा मिल की मीनार आज भी इतिहास की गवाही देती है।

दुआओं में बसा है मेरा भोपाल

मेरे अतीत के झरोखे से कुछ यादगार पल जो मैंने आज भी अपनी यादों में संजोकर रखे हैं। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि 71 वर्ष की उम्र में आज भी भोपाल की इस संस्कृति, भाईचारे और शांति से जुड़ा हूँ। यही दुआ करता हूँ कि यह शहर सदा यूं ही फले-फूले, इसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब को कभी कोई बुरी नज़र न लगे और इसकी खूबसूरती बनी रहे।

 

(लेखक जनसंपर्क संचालनालय, मप्र शासन के सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक हैं)।

🏠 Home 🔥 Trending 🎥 Video 📰 E-Paper Menu