पड़ताल : क्योंकि, सच जानना जरूरी है
राजस्थान और मध्य प्रदेश में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। मामले के तूल पकड़ते ही अब सरकार और दवा कंपनी कटघरे में आ गई है।
हालांकि, दवा ही ज़हर बन गई, यह बात इतनी आसानी से गले नहीं उतर रही, लिहाजा इस मामले की पड़ताल जरूरी थी ताकि सच के करीब पहुंचा जा सके। जो हमने जाना-समझा उसकी चर्चा से पहले हम दवा कंपनियों की लापरवाही पर आते हैं। कफ सिरप ही क्यों?, ऐसी कोई भी दवा जो गुणवत्ताहीन है, दूषित है या एक्सपायरी है वह मार्केट तक पहुंची कैसे? जाहिर है सरकारीतंत्र से मिलीभगत और कालाबाजारी ने ऐसी दवाओं को बाज़ार तक पहुंचाया जो बच्चों की मौत का कारण बनीं। यहां इस बात का जिक्र करना भी लाजिमी है कि ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा और पाया गया है कि, गिफ्ट, कमीशन और नगद उपहार के लालच में आकर कतिपय डॉक्टर्स दवा कंपनियों के ऑफर को स्वीकार कर ऐसी दवाएं लिख देते हैं, जो जरूरी नहीं होतीं।
दवाओं में एडवाइजरी क्यों नहीं?
अब दूसरा पहलू यह भी है कि, 2 साल और पांच साल के बच्चों को दवा पिलाने को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जो एडवाइजरी इस घटना के बाद जारी की है, वह पहले से दवा कंपनियों के लिए जरूरी क्यों नहीं की गई। अगर दो साल से कम उम्र के बच्चों को कफ सिरप नहीं पिलाना चाहिए तो यह बात कफ सिरप की बोतल में लिखी होनी चाहिए थी।( कम से कम उस डॉ को तो यह बात पता होनी चाहिए थी, जिसने दवा लिखी।) अब इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है? सवाल यह भी है कि महज डॉक्टर पर कार्यवाही कर इस संगीन अपराध से सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती, संबंधित दवा कंपनी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। यह दर्शाता है कि सरकार और दवा कंपनी के बीच “कुछ” तो है। खैर, “कुछ” हो ना हो आम जनमानस में यही भाव जागेगा।
अज्ञानता भी एक बड़ी वजह
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के परासिया तहसील में कफ सिरप पीने से जिन बच्चों की मौत हुई, हमारी पड़ताल में व्यक्तिगत तौर पर की गई लापरवाही भी सामने आई है। ( मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इस पड़ताल से सरकार और दवा कंपनी की घोर लापरवाही पर पर्दा डालने का कतई मकसद नहीं है।) “व्यक्तिगत लापरवाही” को हम यूं समझें कि, जागरूकता की कमी या ना समझी। कमोवेश यह घटनाएं जहां जहां हुईं, वहां दवा देने की टाइमिंग और डोज को लेकर अज्ञानता भी देखी गई। 2 साल या उससे कम उम्र के बच्चों को कितनी मात्रा में और कब कब दवा पिलानी है यह जानकारी भी पेरेंट्स को होनी चाहिए। कई बार ज्यादा खांसी चलने पर घबराहट में माता-पिता बच्चों को दवा की ओवरडोज दे देते हैं ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएं ,लेकिन ऐसा करना जानलेवा होता है। हमारी पड़ताल में यह बात भी निकल कर सामने आई है। (लेकिन हम इसी को एकमात्र कारण मान लें यह भी जरूरी नहीं।) दरअसल कफ सिरप किडनी और हार्ट को प्रभावित करता है और यदि यह ओवरडोज बच्चों को दे दी जाए तो यह कितना घातक हो सकता है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। इसीलिए बच्चों को डॉक्टर की निगरानी में ही दवाएं देनी चाहिए।
पड़ताल का दूसरा पहलू यह भी गौर करने लायक है कि, बीमार बच्चों के मामले में कफ सिरप के साथ-साथ दूसरी अन्य मेडिसिन भी दी गईं, (बुखार और सर्दी जुकाम से संबंधित) जिसका नॉलेज भी पेरेंट्स को होना चाहिए। यह पता होना चाहिए कि दवाओं का मिश्रित रूप स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है।
बहरहाल, दूषित दवा, अज्ञानता या व्यक्तिगत लापरवाही हम किसी निष्कर्ष या नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। बच्चों की मौत का मामला बेहद दुखद, मार्मिक और संगीन है, इसकी पूरी निष्पक्षता से जांच होनी चाहिए और ऐसी दवाओं पर भी रोक लगनी चाहिए ताकि भविष्य में और जिंदगियां मौत के मुंह में जाने से बच जाएं।
(लेखक जितेंद्र सूर्यवंशी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
