चकरघिन्नी
खान आशु
संतों, महंतों, काल, महाकाल, मंदिरों और श्रद्धालुओं की नगरी… सियासत, आध्यात्म और सबकी मिली जुली विरासत की नगरी… सड़कों पर बिखरी आस्था… आस्था के बीच छुपी खुराफात… हालात पहले भी बने थे, फिर बनाए गए…!
सड़कों पर निकला सैलाब… आस्था में डूबे लोग…! जिनके लिए आस्था है, उनके साथ दूसरों का सम्मान भी सभी का नैतिक दायित्व है…! लेकिन आस्था में लिपटी चरण पादुकाएं किसी दूसरे मजहब पर उछाली जाना किस धर्म में सिखाई जा रही है, इसका ख्याल किया जाना चाहिए…! इस एक हरकत के असरात कहां से कहां तक आ सकते हैं इस बात का ख्याल भी रखने की जरूरत है…!
मुखिया और कानून व्यवस्था संभालने के जिम्मेदार के शहर में हादसा होकर खामोशियों में दब जाता है…! नफरती चिंटू मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं… ठीक वैसे ही मुस्कुरा रहे हैं, जैसे किसी पर थूकने का इल्ज़ाम लगा कर खुश हुए थे…! झूठ की बिना पर हुई कार्यवाही की तत्परता और चीख चीख कर बयां हो रहे सच की खामोशी से अंदाज लगाया जा सकता है कि बेइमानी मन में समा गई है या किसी पर कार्यवाही करने का खौफ समाया हुआ है…!
खामोश वह भी बैठे हैं, जिनके जिम्मे क़ौम ने खुद को कर रखा है… डर है कि कुछ कहेंगे तो राज गद्दी से बेदखल कर दिए जाएंगे..!
पुछल्ला
स्वयंभू न्यायाधीश(?)
प्यार, मुहब्बत, इश्क़। न रुका है, न रुकेगा। इसने जात देखी, न रुतबा, न उम्र। सजा देने के चौधरी वह कैसे बन गए, जिन्हें खुद के घर में कहने का कोई हक नहीं। न्याय प्रिय पुलिस भी अब कार्यवाही उसके खिलाफ कर रही है, जिसने प्यार किया है। नफरत फैलाने वाले पुलिस के सहयोगी बनकर बैठे हैं।
29/जून/2025
देखो दीवानों तुम ये काम न करो…!
