जय के सुसराल भोपाल में भी हैं वीरू के चाहने वाले… निधन पर छाया शोक

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हर साल मनाते थे जन्मदिन, काटते थे केक
दीवानगी ऐसी कि धरम के सिवा देखी नहीं किसी की फिल्म

खान आशु
भोपाल। जय और वीरू का दोस्ताना जगजाहिर है..! जय का सुसराल भोपाल में है तो वीरू के चाहने वालों की भी यहां कमी नहीं है। लेकिन इनमें एक चाहने वाला ऐसा भी है, जो धर्मेंद्र की सालगिरह पर केक काटने का सिलसिला बरसों से बनाए हुए हैं। इस मौके पर मिठाई बांटकर भी वे खुशियां मनाते हैं। धरम के लिए उनकी दीवानगी का आलम यह है कि उन्होंने अपने बचपन से अब तक धर्मेंद्र के अलावा किसी एक्टर की फिल्म ही नहीं देखी।
पुराने भोपाल का इमामी गेट इलाका। यहां स्थित है एक सैलून। नाम है मॉडर्न सैलून। यहां जिस शख्स का राज है, उनका वास्तविक नाम अधिकांश लोग जानते भी न होंगे। अब उनका नाम धरम ही प्रचलित हो गया है। दुकान में प्रवेश करते ही धर्मेंद्र के लिए दीवानगी पोस्टर, फोटो, पेपर कटिंग्स आदि से दिखाई दे जाएगी। दसों तरह के फोटो यहां मौजूद हैं, जिनमें धर्मेंद्र विभिन्न मुद्राओं में दिखाई देते हैं।

सिर्फ धरम
धर्मेंद्र के लिए धरम की दीवानगी बहुत लड़कपन में ही शुरू हो गई थी। धर्मेंद्र की शुरुआती फिल्मों से बढ़ा रुझान कब अंदर तक समा गया, उन्हें पता ही नहीं चला। स्कूल के टाइम से लेकर कारोबारी समय तक धर्मेंद्र के लिए काम को दूसरे क्रम को रखना उनकी आदत हो गया। धर्मेंद्र की हर फिल्म को कई बार देखना उन्होंने अपने जरूरी कामों में शामिल कर लिया। फिल्मों से मन नहीं भरने पर उन्होंने धर्मेंद्र अभिनीत फिल्मों की वीडियो कैसेट और सीडी का भी जखीरा जमा कर लिया। धरम ने टॉकीज के समय काल में महज धर्मेंद्र की फिल्में देखी। एक एक फिल्म को कई कई बार देखा। थियेटर में धर्मेंद्र की फिल्म रिलीज होना किसी त्यौहार की तरह होता था, इसे अपने दोस्तों को दिखाना भी वे न भूलते थे।

धर्मेंद्र के बाद सनी और बॉबी भी
धर्मेंद्र की फिल्मों का जब बाजार कम हुआ तो धरम ने सनी और बॉबी देओल की फिल्में भी उसी चाव और उत्साह के साथ देखीं। सनी और बॉबी में भी उन्हें धर्मेंद्र की झलक मिलती थी। उन्हें वे धर्म परिवार का अहम हिस्सा करार देते हुए उसी समान स्नेह देते थे।

मुंबई भी पहुंचे
धरम के ऊपर जब धर्मेंद्र का नशा सिर चढ़कर बोलता था, तब वे अपने प्रिय हीरो से मिलने मुंबई भी जा पहुंचे थे। बड़ी मशक्कतों के बाद आखिर उनकी मुलाकात धर्मेंद्र से हो गई। इसके लिए उनके मददगार खुद धर्मेंद्र के पिता मददगार बने थे। इस यात्रा में उन्हें मुंबई के रंग देखने को भी मिले और वहां के कुछ लोगों से मिलने का मौका भी मिला।

मनाते हैं सालगिरह
धरम के अलावा भी धर्मेंद्र के दीवानों की शहर में मौजूदगी है। जिन्होंने धर्मेन्द्र के लिए एक क्लब भी बनाया है। हर साल धर्मेंद्र की सालगिरह पर सेलिब्रेशन किया जाता है। केक काटा जाता है। मिठाई बांटकर जश्न मनाया था।

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