दिल की बात, दिल से…

Share :

चकरघिन्नी.कॉम

खान आशु

सड़क किनारे दर्द से कराहते व्यक्ति की कुशल क्षेम पूछने, उसे इलाज मुहैया कराने, परिजन को सुरक्षित घर तक पहुंचाने वो काफिला रुकवा लेते हैं…! चाय के ठेले, आम या भुट्टे देखकर वो अपना प्रोटोकॉल बिसरा देते हैं…! दूध के कड़ाव पर भी भीड़ भरे इलाके में ठहरने में वे नहीं झिझकते…!
बात मासूमों के अचानक दुनिया से रुखसत हो जाने की हो, तो वे संवेदनशीलता को कहां छोड़ सकते थे…? गलती के लिए कसूरवारों को जांच के घेरे में डालने दल गठित कर दिया गया…! शुरुआती दोषियों को सलाखों के पीछे भी पहुंचा दिया…! मन न माना तो बीमारों से मिलने भी जा पहुंचे, किसी पराए परदेस में…!
आदत कीड़े खोजने की है, खोजे जाने लगे हैं…! मौत पर मातम की बजाए रोटियां सेंकने की आदत है, सेंकी जा रही है…! यह किया होता तो, वह न होता… ऐसा कर लेते तो वैसा न हुआ होता, की पीपडी बजने लगी है…!
संवेदनशीलता, दूसरों का दर्द समझने की आदत, सबके विकास और सबके साथ की धारणा रखने वाले का ही विरोध सिर्फ इसलिए करना है कि हम विपक्षी हैं, तो करो…! लेकिन यह पब्लिक है, सब जानती है, अपने भैया को भी पहचानने में उनसे गलती नहीं होने वाली…!

पुछल्ला
बिल्ली के भाग से छींका नहीं टूटा करता। अपनी कमियों, कमजोरियों, गलतियों से हाथ आई सरकार गंवा बैठे लोग अब बैठे थाले कोई कमी होने की राह तकते रहते हैं। लेकिन हालत यह हैं कि न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।
===============
10/10/2025

🏠 Home 🔥 Trending 🎥 Video 📰 E-Paper Menu