विरासत स्थलों के संरक्षण को नया आयाम – वर्षा जल प्रबंधन

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भोपाल। संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, मध्य प्रदेश द्वारा “विरासत स्थलों का सुरक्षात्मक संरक्षण” विषय पर आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन आज सफलतापूर्वक हुआ। यह कार्यक्रम विरासत स्थलों के संरक्षण को हरित व स्थायी समाधान के रूप में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य विरासत स्थलों को क्षरण से बचाने के साथ-साथ जल संसाधनों के समुचित उपयोग को समझना और लागू करना था।

इस कार्यक्रम के बारे में बताते हुए डॉ. रविन्द्र ठाकुर ने संरक्षण के क्षेत्र में वर्षाजल प्रबंधन को एक नई दिशा देने का प्रयास किया। उन्होंने कहा,
“हमारी धरोहरें पानी के पास जन्मी हैं — बावड़ियाँ, तालाब, सरोवर और नदियाँ, ये सब हमारे इतिहास के साक्षी हैं। जल प्रबंधन की पारंपरिक पद्धतियों को समझना और उन्हें पुनर्जीवित करना, संरक्षण के साथ-साथ समाज को भी जल संकट से उबारने का मार्ग है।”
कार्यक्रम में वर्षाजल के कारण होने वाली क्षतियों तथा उन्हें रोकने के उपायों पर केंद्रित प्रस्तुतियाँ, तकनीकी सत्र, फील्ड विज़िट, और ओपन डिस्कशन का आयोजन किया गया।
प्रशिक्षण के दौरान कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट, ग्राउंड वाटर रिजर्वेशन, रनऑफ वॉटर मैनेजमेंट, रूफ वॉटर ट्रीटमेंट और बावड़ियों के पुनर्जीवीकरण जैसी तकनीकों पर विस्तृत जानकारी दी गई।
कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रतिभागियों को जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान (WALMI) की फील्ड विज़िट कराई गई, जहां उन्हें कैचमेंट एरिया डिमार्केशन, वर्षाजल संचयन प्रणाली, ग्राउंडवॉटर रिचार्जिंग, और परफोरेटेड पाथवे जैसी तकनीकों का प्रत्यक्ष अवलोकन कराया गया।
कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों के मूल्यांकन, प्रश्नोत्तर सत्र, और प्रमाणपत्र वितरण के साथ हुआ। इस अवसर पर संचालनालय की संयुक्त संचालक डॉ. मनीषा शर्मा भी उपस्थित रहीं।

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