महिला अधिकारियों से दुर्व्यवहार का मामला: जांच नहीं, जुगाड़ चला
आरोपी को मिला मुख्यालय में अटैचमेंट, एमडी की भूमिका सवालों में

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फेवरिज़्म के आरोपों से घिरा प्रबंधन, कार्रवाई की बजाय मिली सुविधा, कर्मचारी और महिलाएं दोनों आहत

भोपाल। मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के अंतर्गत संचालित बरखेड़ा पठानी स्थित लघु वनोपज प्रसंस्करण केंद्र में संविदा पर पदस्थ वैज्ञानिक डॉ. दीपक द्विवेदी पर महिला अधिकारियों के साथ अशोभनीय व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगने के बावजूद विभाग ने उनके विरुद्ध कोई सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की है। इसके विपरीत, उन्हें ‘सम्मानजनक’ रूप से संघ के मुख्यालय में अटैच कर दिया गया है। यह फैसला विभाग के प्रबंध संचालक विभाष कुमार ठाकुर द्वारा लिया गया, जिसने न केवल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि महिला अधिकारियों की सुरक्षा और गरिमा को लेकर शासन की मंशा पर भी गंभीर संदेह पैदा कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार, बीते सप्ताह के भीतर दो महिला अधिकारियों ने डॉ. द्विवेदी के खिलाफ अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराईं। पहली शिकायत केमिकल साइंटिस्ट विजेयता श्रीवास्तव द्वारा की गई थी, जिसमें निरंतर मानसिक प्रताड़ना और अपमानजनक व्यवहार का आरोप था। दूसरी शिकायत समीक्षा बैठक के दौरान की गई घटना को लेकर थी, जहाँ डॉ. द्विवेदी ने मुख्य कार्यपालन अधिकारी से न केवल अभद्र भाषा में बात की, बल्कि रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से भी इनकार कर दिया। इस दौरान कई अन्य अधिकारी भी मौजूद थे, जिन्होंने उक्त व्यवहार को अत्यंत आपत्तिजनक बताया।
इन शिकायतों के बावजूद विभागीय स्तर पर तत्काल कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई। बल्कि उलटे, प्रबंध संचालक द्वारा डॉ. द्विवेदी को उनके अनुरोध पर मुख्यालय में तैनात कर दिया गया। विभागीय सूत्र बताते हैं कि यह तैनाती विभागीय मानकों के प्रतिकूल है और इससे साफ संदेश गया है कि आरोपी अधिकारी को संरक्षण दिया जा रहा है। इससे प्रबंध संचालक विभाष कुमार ठाकुर की भूमिका भी कटघरे में आ गई है। इस संबंध में लघु वनोपज संघ का पक्ष जानने के लिए के प्रबंध संचालक ठाकुर एवं संविदा वैज्ञानिक द्विवेदी से सम्पर्क करने की कोशिश की, पर सम्पर्क नहीं हो पाया।

विभाग के अंदर इस घटनाक्रम को लेकर जबरदस्त असंतोष है। कर्मचारी वर्ग इस निर्णय को महिला सम्मान और संस्थागत अनुशासन के खिलाफ मान रहा है। कई अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यदि ऐसा ही संरक्षण मिलता रहा, तो महिला अधिकारी भविष्य में किसी भी प्रकार की शिकायत करने से हिचकेंगी। इससे विभागीय वातावरण असुरक्षित और पक्षपातपूर्ण बन जाएगा।

प्रशासनिक सूत्रों का यह भी कहना है कि डॉ. द्विवेदी का कुछ प्रभावशाली अधिकारियों से निकट संबंध रहा है, जिसकी वजह से उनके खिलाफ कार्रवाई रोक दी गई। यही कारण है कि विभाग में यह धारणा बन रही है कि अगर कोई अधिकारी उच्च संपर्क में है, तो उसे किसी भी तरह की शिकायत से डरने की आवश्यकता नहीं है।
इस पूरे प्रकरण ने शासन की महिला सुरक्षा और सम्मान की नीति पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। एक ओर मुख्यमंत्री मंचों से महिला सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके ही अधीनस्थ विभाग में महिला अधिकारियों की शिकायतों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे यह आभास होता है कि सरकार की नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मामले को लेकर कोई सख्त कदम उठाती है या इसे भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा। यदि इस पर शीघ्र और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घटना विभाग की साख के साथ-साथ महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और आत्मसम्मान को भी गंभीर खतरे में डाल सकती है।

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