महावीर जयंती पर विशेष
भगवान महावीर स्वामी जिनका नाम सुनते ही हृदय में अहिंसा, सत्य, दया और वात्सल्य के भावों की बल्लरियां हिलोरे मारने लगती हैं। सदाचरण और नैतिकतापूर्ण जीवन के हर मापदंड पर भगवान महावीर की शिक्षाएं, हमें आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। उनके बताए हर सिद्धांत वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संजीवनी के समान कारगर साबित हो रहा है। 21वीं सदी आधुनिक तकनीकीकरण और सोशल मीडिया को समर्पित है। यह समय भौतिक चकाचौंध से भरा है। युवा आगे बढ़ने की होड़ में लगे हैं। आर्थिक विकास का मापदंड ही सब कुछ पाना है। संवेदना शून्य होते समाज में स्वार्थ हावी है। ऐसे में अगर मानव समाज में सामंजस्य बैठाना है, तो भगवान महावीर के ”जिओ और जीने दो” के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करना होगा।
भगवान महावीर जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं
वर्तमान में युवा, बुजुर्ग सभी डिप्रेशन और बीमारियों से ग्रसित हैं। मानसिक तनाव लोगों पर प्रभावी है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस किसी ने भी भगवान महावीर को समझा है, वो कभी भी जीवन में डिप्रेस्ड नहीं हो सकता है। पैसा हो या न हो, यह जरूरी नहीं है। आज हम भगवान महावीर के जीवन से कुछ सीखने और सुखमय जीवन कैसे बनें इस प्रबंधन को समझने वाले हैं। भगवान महावीर का जीवन दर्शन सुखमय जीवन जीने की कला सिखाता है। सच्चे अर्थों में भगवान महावीर स्वामी हमारे गुरु हैं, क्योंकि उनकी शिक्षाएं जीवन को सही दिशा प्रदान करती हैं।
वर्धमान से भगवान महावीर बनने की यात्रा
भगवान महावीर श्रमण परंपरा के वह सूर्य हैं, जिनकी आभामात्र से हिंसक प्रवृत्ति, अहिंसावृत्ति में बदल जाती है। क्रूरता और क्रोधाग्नि का अकुंर फूटने से पहले ही विलय को प्राप्त हो जाता है। वर्धमान से भगवान महावीर बनने की यात्रा में हमें कठिन दिखाई देती है, लेकिन उनका मार्ग सबसे सरल है। वो कहते हैं, “स्वयं को जानना ही परमानंद है और यही मोक्षमार्ग का सोपान है। साथ ही संयम का मार्ग हमें आत्मनिर्भर बनने एवं पराश्रित बुद्धि से मुक्त करता है।” आज भले ही भगवान महावीर का संदेश आमजन के लिए न होकर जैनों तक सीमित लगता है, लेकिन यह बात सत्य नहीं है। उनका हर सिद्धांत विश्व के प्रत्येक मानव को जीवन जीने की कला सिखाता है। जिसने भी उन्हें जान लिया, वह कभी निराश नहीं हो सकता है और न ही कभी डरपोक और निरंकुश होगा, बल्कि हर परिस्थिति का वह धैर्य और संयम से सामना करेगा।
पैसे से सुख की प्राप्ति असंभव
भगवान महावीर की वाणी यथार्थ की संकल्पना को साकार करती है। हमारा गृहस्थ जीवन कैसे भौतिक संसाधनों व आध्यात्मिक अनुभूतियों के साथ सुखमय बनें, यह विचार मस्तिष्क में कई बार कौंधता तो जरूर है, लेकिन मन मसोट कर रह जाने की हमारी प्रवृत्ति ऐसे विचारों को जन्म देने के पहले ही कुचल देती है। नतीजतन यह घातक साबित होता है। हमारा जीवन पैसों की ओर भाग रहा है, लेकिन उस धन और भोग में सुख की अपेक्षा मानसिक वेदना अधिक समावेशित है।
जीवन प्रबंधन के गुरु हैं महावीर
जीवन को आनंद और शांतिपूर्ण बनाने के लिए भगवान महावीर द्वार कुछ अनमोल सिद्धांत दिए गए हैं, जिसे समझने मात्र से जीवन को गति और मन को असीम संतुष्टि की प्राति होती है। भगवान महावीर कहते हैं, ”जितनी जरूरत है, उतना संग्रह करें…” भगवान महावीर स्वामी ने पांच महाव्रत का उपदेश दिया है। उनमें से एक महाव्रत अपरिग्रह है। अपरिग्रह का अर्थ है, “परिग्रह” (जोड़ना, इकट्ठा करना) का अभाव, यह सिखाता है कि व्यक्ति को केवल वही लेना चाहिए, जिसकी उसे जरूरत है या जो काम आता है और अनावश्यक चीजों को छोड़ देना चाहिए।
अब आप समझें कि हम अंधी दौड़ में स्टेट्स मेंटेन करने की जुनूनी दुनिया में वह सब जोड़ने लगे हैं, जिसकी हमारे जीवन में कोई जरूरत नहीं है। ऐसी अनावश्यक वस्तुओं को जोड़ने में हम अपनी बुद्धि व शारीरिक बल को दांव पर लगा देते हैं और एक दिन ऐसा भी आता है, जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं और यह धन ऐशोआराम यहीं रह जाते हैं और मानसिक शांति छूमंतर हो जाती है। भगवान महावीर कहते हैं कि जीवन को कठिन नहीं सरल बनाओ, जो जितना स्वयं को जानने में लगा, वह उतना गहरा होता चला गया। अर्थात अनावश्यक वस्तुओं का जोड़ना समझदारी का काम नहीं है।
”न्याय से कमाओ, विवेक से खर्च करो”
भगवान महावीर खुद में एक प्रबल सिद्धांत हैं। उनके सत्य महाव्रत में सत्य के मौलिक अर्थों का उल्लेख मिलता है।
वह कहते हैं कि जो कुछ भी है, उसे ठीक-ठीक और स्पष्ट रूप से कहना, बिना किसी झूठ या कपट किए बिना सत्य को निष्ठा के साथ पेश करने की विधा ही जीवन को आनंदमय बनाती है। यह सत्य अगर जीवन में समाहित हो जाए, तो सारी समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो सकती है। हम पैसा तो कमाना चाहते हैं, लेकिन हमारा तरीका दूसरे को छल-कपट से बर्बाद कर आगे बढ़ने की चाहत कतई सुख नहीं दे सकता है। महावीर स्वामी ने कहा है कि न्याय की कसौटी पर कमाया गया धन जीवन को सही दिशा और दशा प्रदान करता है। हम कमाते कितना है, उससे ज्यादा जरूरी है कि हम पैसे को कैसे खर्च करते हैं। अगर हमारी कमाई कम भी है, लेकिन उसे विवेकपूर्वक खर्च किया जाए तो हम सुखमय जीवन जी सकते हैं। हमेशा ही न्याय से कमाने और विवेक से खर्च करने की आदत ही जीवन में अपनानी चाहिए।
किसी का दिल न दुखाना ही जीवन का सबसे बड़ा कर्म
भगवान महावीर स्वामी ने अहिंसा महाव्रत का संदेश देते हुए कहा है कि किसी भी प्राणी के प्रति हिंसा का भाव मत रखो। चींटी से लेकर हाथी तक सभी जीवों में चेतना है। किसी को दर्द मत पहुंचाओ, किसी को मत सताओ, यही अहिंसा का मार्ग है। अगर हमने वाणी और वचनों से भी किसी को अपशब्द कहे हैं, तो वह भी हिंसा है और यह हिंसा भी हमें शांतिपूर्ण जीवन जीने से वंचित कर सकती है। अगर जीवन को सुखमय बनाना है, तो सरलता के साथ अहिंसक आचरण अपनाएं। जीवन को इतना पवित्र बनाएं कि हमें किसी को कटु शब्द न बोलना पड़े और ऐसे विचारों के साथ जब हम आगे बढ़ेंगे, तो निश्चित ही हमारा जीवन आनंदमय बनेगा।
मैत्री भाव व आपसी सामंजस्य की नींव रखें
भगवान महावीर स्वामी के जीवन को देखें, तो उनकी सादगी और शांत छवि को देखकर जंगल के क्रूर-हिंसक जानवर भी उनके पास आकर बैरभाव भूल जाते थे। सांप और नेवला, गाय और शेर एक साथ सरोवर में पानी पीते थे। महावीर स्वामी के जीवन का यह उद्धरण हमें बताता है कि आप जैसी संगती में रहते हैं, उसका असर आप पर पड़ता है। अत: अपने गृहस्थ जीवन को सरल बनाने के लिए सभी से मैत्री भाव रखना जरूरी है। निंदा, अपमान, मान-सम्मान के कुचक्र जैसे बुरे विचारों से स्वयं दूर रहें। प्रत्येक जीवों के प्रति दया, करूणा और वात्सल्य के भाव बनाए रखें। मन की पवित्रता निष्पकट होनी चाहिए। यहीं से क्षमाभाव का प्रादुर्भाव संभव है, जो जितना सरल होगा वह उतना ही शांतिप्रिय होगा। मैत्री भाव सब जीवों के प्रति सर्वेभवन्तु की भावना को मूर्त रूप देती है।
प्रशंसा से मुग्ध न हों
भगवान महावीर स्वामी ने स्पष्ट कहा है कि अंहकार का भाव दुर्गति का कारण है। मोह और मान का परिणाम घातक है। अगर कोई हमारी प्रशंसा करे, तो भी हमें अहमी नहीं बनना चाहिए। अत: हमें साधन और संयोग न मिले, तो भी दुखी नहीं होना चाहिए। हर परिस्थिति में मुस्कुराते रहें और भगवान का स्मरण करते रहें।
निंदा के जहर से बचें
भगवान महावीर ने कहा है कि कभी भी दूसरों की निंदा न करें। हमेशा अच्छाई लोगों में देखें। अगर नकारात्मक विचार जन्म लेते हैं, तो उनसे कर्मबंध बंधता है और इन कर्मों का फल जीव को नियम से भोगना पड़ता है। अत: निंदा जैसे अवगुण से स्वयं को दूर रखें। आगम ग्रंथों के स्वाध्याय करने की प्रवृत्ति को अपनाएं। स्वाध्याय को जैन ग्रंथों में परम तप कहा गया है। शास्त्रों का पठन-पाठन हमें आत्मकेन्द्रित बनाता है। इसका फल यह है कि कोई हमारी निंदा भी करे, तो हम उन भावों से विचलित नहीं होते हैं।
पुरुषार्थ के साथ आत्मउन्नति के मार्ग को प्रशस्त करें
भगवान महावीर ने कहा कि प्राणी मात्र के प्रति अहिंसा का भाव रखें, निरंतर आत्महित के मार्ग का पुरुषार्थ करें। अगर जीवन को सुखमय बनाना है, तो सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र इन रत्नत्रय को जीवन में अपनाएं। जिसने सम्यकदर्शन को पा लिया उसकी आत्मउन्नति का पथ प्रशस्त हो गया। सम्यकदर्शन का अर्थ अपने आत्मस्वभाव को पहचाना अर्थात अखंडानंद स्वरूप आत्मतत्व की प्राप्ति करना है। जिसने स्वयं को पा लिया मानों उसने सम्यक पुरुषार्थ की प्राप्ति कर ली। अत: हमारे जीवन का लक्ष्य मात्र भौतिक सुख को पाना नहीं, बल्कि हमें स्वयं को जानकर आत्म उन्नति के मार्ग की ओर अग्रसर होना चाहिए।
आयु निरंतर घट रही है। ऐसे में आत्मजागृति से अपने जीवन सफल बनाने का पुरूषार्थ करना होगा। महावीर स्वामी का हर सिद्धांत तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है। उनका दर्शन हमें अपने जीवन को कैसे जीना है, इसकी शिक्षा प्रदान करता है। मनुष्य जन्म को अगर सार्थक करना है, तो महावीर स्वामी के सिद्धांतों को आत्मसात कीजिए।

