भोपाल। संचालनालय पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय भोपाल मप्र के अंतर्गत डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान, भोपाल द्वारा प्रख्यात पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के पुण्य तिथि के अवसर पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। आयोजन का प्रारंभ मुख्य वक्ता प्रोफेसर आलोक त्रिपाठी अतिरिक्त महानिदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नई दिल्ली एवं डॉ. भुवन विक्रम, क्षेत्रीय निदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मध्यक्षेत्र भोपाल एवं डॉ. मनीषा शर्मा निदेशक डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। कार्यक्रम की अगली कड़ी में डॉ. मनीषा शर्मा निदेशक डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान ने अपने उद्बोधन में संस्थान के परिचय एवं गतिविधियों तथा डॉ. वाकणकर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए व्याख्यान के लिए आमंत्रित वक्ताद्वय का परिचय कराया।
इस कड़ी में मुख्य वक्ता प्रोफेसर आलोक त्रिपाठी ने “अंडर वॉटर आर्कयोलॉजिकल इन्वेस्टीगेशनस” विषय पर अपना व्याख्यान दिया। जिसमें बंगाराम आईलैंड लक्षदीप तथा द्वारका में किये गये अंडर वॉटर आर्केयोलॉजी में किये गये कार्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया। प्रो. त्रिपाठी प्रिंस रॉयल कार्गोशीप जो सन् 1792 में दुर्घटना ग्रस्त होकर जलमग्न हो गई थी, की खोज पर विस्तृत विवरण दिया। प्रकाश डाला गया। इस कार्गोशीप की खोज में उपलब्ध चुनौतियों एवं उसके मलबे से प्राप्त तोप एवं अन्य पुरावशेषों की जानकारी दी गई। तदुपरांत अंडर वॉटर आर्केयॉलोजी टीम द्वारा द्वारका की खोज के अन्तर्गत किये गये उत्खननों को रेखांकित किया गया एवं साहित्यों, महाभारत एवं पुराणों में उल्लेखित विवरणों के आधार पर तथा पूर्व में किये गये पुरातत्वीय कार्यों की जानकारी देते हुए द्वारका के समुद्री क्षेत्र में की गई खोज की जानकारी दी गई। द्वारका नगर की स्थापना महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा की गई थी, और उनके उपरांत उसके समुद्र में समाहित होने की जानकारी पुराणों से प्राप्त होती है। इसी आधार पर प्रो. त्रिपाठी द्वारा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अंडर वाटर आर्कयोलॉजिकल शाखा का पुनर्गठन किया गया है। प्रो. त्रिपाठी के निर्देशन में द्वारका की खोज संबंधी उत्खनन् चल रहे है। प्रोफेसर त्रिपाठी ने वर्तमान में पुरातत्वीय अन्वेषणों के क्षेत्र में आधुनिक तकनीकी का उपयोग कर एवं अन्य एजेंसियों की सहभागिता से पुरातत्वीय अन्वेषणों को आगे बढ़ाने पर भी आवश्यकता प्रतिपादित किया गया।
डॉ. भुवन विक्रम क्षेत्रीय निदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा मंदिर स्थापत्य उद्भव एवं विकास यात्रा का विशिष्ट पड़ाव बाजरा मठ ग्यारसपुर पर अपने विचार रखा गया। डॉ. विक्रम ने अपने व्याख्यान में मध्यप्रदेश के संदर्भ में मंदिरों की क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला, एवं विदिशा जिले के ग्यारसपुर के बाजरा मठ मंदिर की विशद् विवेचना में अवगत बताया कि, यद्मि कई त्रिकुट मंदिर सूचित है परन्तु बाजरा मठ मंदिर एक ऐसा त्रिकुट मंदिर है, जिसके तीनों गर्भ गृह एक साथ समान्तर में निर्मित है, और यह तीनों मंदिर किसी पंथ विशेष के न होकर तीन विविध देवताओं यथा मध्य में सूर्य एवं एक तरफ शिव और दूसरी तरफ संकर्षण को समर्पित है, जिनकी पुष्टि इन गर्भ गृहों के प्रवेश द्वार के ललाटबिंब पर अंकित प्रतिमाओं एवं अन्य गौड़ देव आकृतियों यथा द्वादश आदित्य, द्वादश रूद्र आदि के अंकन से होती है। यहाँ से प्राप्त प्रतिमाएं यथा अर्द्धनारीश् वर, हरिहर, हरसूर्य, मिश्रित प्रतिमाएं है, जो विविध देवताओं के संयुक्त रूप को प्रस्तुत करती है। इसी तारतम्य में यह भी प्रकाश डाला गया कि, मध्यप्रदेश विशेषतः विदिशा में सूर्य मंदिर का निर्माण हुआ। विदिशा का बीजामंडल सम्भवतः मूलरूप से सूर्य मंदिर रहा होगा, जो भैलस्वामी के नाम से प्रसिद्ध था।
कार्यक्रम के मंच का संचालन डॉ. रमेश यादव, पुरातत्वीय अधिकारी एवं अन्त में डॉ. धुर्वेद्र सिंह जोधा द्वारा आमंत्रित अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया गया।
अपनी विरासत : व्याख्यानमाला में उकेरी गईं प्रदेश की धरोहर, जिनका है दुनिया में नाम
