खान आशु
भोपाल। नारी… हर दौर में अपने दम पर तटस्थ, मजबूत और सब कुछ कर दिखाने की इच्छा शक्ति रखने वाली। बेटी, बहन, बीवी और मां बनकर सबको संबल देने को तत्पर, लेकिन किसी के साथ न होने की वजह से पिछड़, ठिठक या ठहर जाने को कतई तैयार नहीं। हमारे आसपास ही ऐसी कई महिलाएं खड़ी हैं, जिन्होंने अकेले दम पर खुद को साबित भी किया और समाज में सशक्तीकरण की नई मिसाल भी स्थापित कर दी है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मुलाकात कीजिए प्रदेश की कुछ ऐसी ही कुछ महिलाओं से जिन्होंने अपने दम पर खुद को साबित भी किया और लोगों को एक राह भी दिखाई।

हुमैरा खान : बनाई अपनी राह, दूसरों के रास्ते किए आसान
खिलौनों से खेलने की उम्र में ही हुमेरा के सिर से पिता का साया उठ गया। दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी भोपाल गैस कांड के दौरान वे यतीम हो गईं। अम्मा सितारा बी ने मशक्कतों के साथ एक बेटे और एक बेटी का लालन पालन शुरू किया। घर खर्च चलाने वे सिलाई कढ़ाई का काम किया करती थीं। हुमेरा ने हुनर का पहला सबक यहीं से सीखना शुरू किया। जरी जरदोजी के इंस्ट्रूमेंट उनके हाथ उस उम्र में आ गए, जब इन हाथों में किताबें और खिलौने होना थे। मुश्किलों में बचपन से जब हुमेरा बाहर निकलीं तो उनके हाथ जरी जरदोजी का परफेक्शन था। वर्ष 2007 में उनके काम को सराहा गया और प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हुमेरा को राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित किया। सिलसिला शुरू हुआ तो कामयाबी की कहानियां लिखता गया। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय ने हुमेरा को इंम्पेनेल करते हुए विभाग से होने वाली सभी प्रशिक्षण कार्यक्रमों का मास्टर ट्रेनर बना लिया। करीब डेढ़ दशक के अपने जरी जरदोजी संसार में वे हजारों महिलाओं को हुनरमंद और आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर हर बड़े शहर तक अब उनकी कला के पताके लहराते नजर आते हैं। अपने काम संसार में खुश और संतुष्ट हुमेरा कहती हैं कि साथ अगर जरूरी है तो अपने जोश, उत्साह और बेहतर ऊर्जा वाले साथियों का, जिनसे कामयाबी के रास्ते आसान किए जा सकते हैं। फैशन की दुनिया में खास मुकाम रखने वाली ऋतु बैरी के साथ दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय शो करने से लेकर हाल ही में भोपाल में हुई ग्लोबल इंवेस्टर समिट में अपने हुनर का लोहा मनवा चुकीं हुमेरा को हाल ही में ऊर्जविस्ता अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है।

डॉ. कुसुम बौरासी : मुश्किलें हजार आईं, लेकिन तोड़ नहीं पाईं भरापूरा परिवार, दादा, पिता, मां से लेकर भाइयों का सुखद साथ। कुसुम पढ़ाई के दौर से निकलीं और असिस्टेंट प्रोफेसर बनने का तमगा उनके साथ जुड़ गया। हिंदी भाषा पर महारत रखने वालीं कुसुम के जिम्मे कॉलेज के बच्चों को हिंदी परिपक्वता देना आया। अपने गृह नगर धार से दूरस्थ तहसीलों मनावर और उसके बाद धरमपुरी तक उनकी दौड़ लगी। परिवार से दूर रहते हुए खुद को मजबूत करने का सिलसिला शुरू हुआ। इन मुश्किल दिनों में उनके जीवन का नया अध्याय इंजीनियर राजेश बौरासी के साथ शुरू हुआ। खुशियों से कदमताल करते हुए कुसुम इस दौर में डॉक्टरेट उपाधि हासिल करने में भी कामयाब हो गईं। तहसीलों की सेवा से बाहर निकल कर जिला मुख्यालय धार में उन्हें नियुक्ति भी मिल गई। लेकिन इसी बीच पति राजेश अचानक साथ छोड़ गए। डॉ कुसुम के लिए अब तसल्ली के नाम पर राजेश की दी हुई निशानियां अमन और नमन रह गए थे। जीवन की गाड़ी को वह भारी मन से खींच ही रही थीं कि एक हादसे ने उनसे अपनी खुशियों के सहारे छोटे बेटे नमन से भी जुदा कर दिया। अब अमन और अम्मा का सहारा लेकर वे चलती रहीं और खुद को शिक्षा के लिए समर्पित करते हुए गमों को भुलाने में जुट गईं। जीवन में कुछ स्थिरता बनने के हालात बनने लगे थे लेकिन खुशियां इतनी आसान भी नहीं होती हैं। पहले बाबा ने साथ छोड़ा और उसके कुछ समय बाद अम्मा भी दुनिया से कूच कर गईं। ज्यादा समय नहीं बीता था और जिंदगी की दुश्वारियों में संबल देने वाले भाई ने भी डॉ कुसुम को अकेले छोड़ने का ऐलान कर दिया। पति, बेटे, पिता, अम्मा, भाई से जुदा होने के बाद अब डॉ कुसुम अपने इकलौते बेटे में सारी दुनिया खपाए हुए हैं। ज़िंदगी को सुकून, राहत, तसल्ली देने वह अपने स्टूडेंट्स के साथ समय बिताना पसंद करती हैं। डॉ. कुसुम कहती हैं कि जीवन के निर्वाह के लिए रिश्तों की बहुत अहमियत है, लेकिन कुदरत का दस्तूर स्वीकार करना भी जरूरी है। मुश्किलें आती हैं लेकिन सच्ची लगन और मेहनत हर सफलता की सीढ़ी बनती है।

डॉ.इरशाद खानम : अकेले लिखी कामयाबी की नई तहरीर
उज्जैन की डॉ. इरशाद खानम प्रदेश की इकलौती महिला हैं, जिन्होंने यूजीसी के टफ कंपीटिशन में हिस्सा लेकर पोस्ट डॉक्टर ऑल इंडिया फैलोशिप फॉर वूमेन हासिल की है। राष्ट्रीय स्तर पर इस फैलोशिप में 100 से अधिक महिलाओं को अलग अलग विषय पर फैलोशिप के लिए चुना जाता है। डॉ. इरशाद खानम ने ये उपलब्धि उन हालात में पाई है, जब महज दो साल के बेटे को लेकर वे अपने पति से सेपरेट हो गई थीं। अकेले जीवन यापन करते हुए उन्होंने न सिर्फ खुद की शख्सियत को संवारा, बल्कि बेटे को भी सशक्त और काबिल बनाया। इस्लामिक वातावरण में रहते हुए डॉ. इरशाद खानम ने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए लॉ में डॉक्टरेट उपाधि हासिल की। कॉलेज में अतिथि शिक्षक की भूमिका निभाने के साथ वे खुद का निजी मदरसा संचालित कर रही हैं। साथ ही कानूनी बारीकियां सिखाने के लिए एक न्यूज पोर्टल भी उन्होंने खड़ा किया है। सामाजिक दायरा वृहद हुआ तो डॉ इरशाद ने भाजपा के टिकट पर पार्षद का चुनाव भी लड़ा। ऊर्जा से भरी और कुछ कर गुजरने की ललक रखने वाली डॉ. इरशाद खानम ने अकेले रहते हुए भी ये साबित किया है कि किसी कामयाबी के लिए जरूरी नहीं है कि पीछे कोई मजबूत सहारा खड़ा हो। इरशाद ने अपने दम पर बेटे फैजान को काबिल बनाया, जिसके चलते वे अब सक्रिय सियासत में व्यस्त रहते हुए उज्जैन जिला भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष हैं। साथ ही मप्र वक्फ बोर्ड के सदस्य भी हैं। वर्तमान में इंदौर के एक कॉलेज में बतौर प्राचार्य सेवाएं दे रहीं डॉ इरशाद का मानना है कि जीवन की वैतरणी पार करने के लिए शिक्षा सबसे बड़ा सहारा होती है। इसके दम पर हर जंग आसानी से जीती जा सकती है।

माही भजनी : सम्मान लेने में नहीं सम्मानित करने में विश्वास पति जी की अति व्यस्तता वाली लाइफ स्टाइल ने माही को कुछ अकेला तो किया, लेकिन इस समय को उन्होंने किसी और के चेहरों पर खुशियां लाने के लिए समर्पित कर दिया। अनुनय संस्था के जरिए उन्होंने गरीब और जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई को अपना लक्ष्य बनाया। करीब 14 बरस से माही दर्जनों बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी ओढ़े एक बड़े लक्ष्य की तरफ बढ़ी हुई हैं। साथ ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कुछ हटकर और बेहतर कर गुजरने वाली महिलाओं के सम्मान की एक श्रृंखला भी उन्होंने शुरू की है। मंच से सम्मानित होने वाली सैंकड़ों महिलाओं ने इस उपक्रम से खुद को अधिक ऊर्जा से भरा पाया है। माही कहती हैं कि अपने लिए तो सभी जीते हैं, किसी और के लिए जीने का आनंद मुश्किल से ही नसीब हो पाता है।
