MP News : भारत अपने अध्यात्म और दर्शन के आधार पर विश्व में सर्वश्रेष्ठ, हर युग ने इस बात को माना : डॉ नुसरत मेहदी, जश्न ए उर्दू का दूसरा दिन, जानें क्या हुए प्रोग्राम

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खान आशु
भोपाल। राजधानी भोपाल में जारी मप्र उर्दू अकादमी के आयोज जश्न ए उर्दू का दूसरा दिन कई कार्यक्रमों से लबरेज रहा। दूसरे दिन प्रथम सत्र में “कथा साहित्य का सार्वभौमिक संदेश और वसुधैव कुटुंबकम” विषय पर अफ़साने का अफ़साना आयोजित हुआ। शुरुआत में अकादमी निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने दूसरे दिन के आयोजन रूप रेखा पर बोलते हुए कहा कि जश्न ए उर्दू केवल एक तक़रीब या जश्न नहीं है, यह हमारी संस्कृति, हमारे मूल्यों और समृद्ध परंपराओं को याद दिलाने और याद रखने का प्रयास भी है। भारत अपने अध्यात्म और दर्शन के आधार पर विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, यह बात हर युग ने मानी है। साहित्य इस स्वीकारोक्ति का सशक्त माध्यम है। हमारा यह साहित्योत्सव उर्दू भाषा के हवाले से “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना को बढ़ावा देने का प्रयास है।

एकता और भाईचारा समाज की जरूरत : डॉ उम्मीद
इस सत्र में वक्ता के रूप में डॉ अली अब्बास उम्मीद भोपाल, और इशरत नाहिद लखनऊ उपस्थित थे। डॉ अली अब्बास उम्मीद ने विषय पर बोलते हुए कहा कि आज के इस सत्र का विषय उर्दू कथा साहित्य का सार्वभौमिक संदेश वसुधैव कुटुम्बकम बहुत महत्वपूर्ण है। मैं समझता हूँ कि हर ज़माने में एकता और भाइचारा समाज की अहम ज़रूरत है। आदमी को इंसान बनने के लिये ज़रूरी है कि वो आदमी को आदमी समझे उसके बाद ही वो कह सकता है कि मैं इंसान हूँ। वो अपने कर्मों के द्वारा समाज में शांति का संदेश फैलाने का काम करे और उर्दू की केवल एक विधा में नहीं बल्कि तमाम विधाओं में हमेशा से ये संदेश दिया गया है।
लखनऊ से आईं कथाकार इशरत नाहिद ने कहा कि जब हम इस वसुधैव कुटुम्बकम के शब्दों की गहराई में जाते हैं और इसे खंगालने की कोशिश करते हैं तो इसके अर्थों की गहराइयां हमें मूल्यों और संस्कारों के पाठ की तरफ़ ले जाती हैं। केवल इंसानी मूल्यों और संस्कारों का पाठ ही नहीं पढ़ातीं, बल्कि पूरी दुनिया को इंसानियत को एक कसौटी प्रदान करती हैं जिस पर चल कर समाज में सुख शांति क़ायम हो सकती है। इस सत्र का संचालन सिरोंज की युवा लेखिका स्तुति अग्रवाल ने किया।

प्रादेशिक मुशायरे में बरसे कलाम
द्वितीय सत्र में प्रादेशिक मुशायरा सम्पन्न हुआ। मुशायरे में प्रदेशभर से आए नामवर शायरों ने कलाम पेश किया। मुशायरे का संचालन इरफ़ान झांसवी ने किया।

डॉ शान फ़ख़री, सिरोंज
ये जो इतना ग़ुरूर है मुझमें
कोई ख़ामी ज़रूर है मुझमें

अज़ीज़ अंसारी, इंदौर
ऐ अज़ीज़ बतला दो मेरे इस मुआलिज को
जिस्म तो सलामत है ज़ख़्म सारे अंदर

मजाज़ आशना, बुरहानपुर
आसमानों की तमन्ना में कहीं के न रहे
ख़्वाब वो देखे थे हमने कि कहीं के न रहे

रक़ीब अंजुम, भोपाल
मसअले तो ज़िन्दगी के साथ हैं
हम तो आँखों की नमी के साथ हैं

साबिर सहबा, इंदौर
नज़्म जब तक नया ख़्याल न हो
शेर का हक़ अदा नहीं होता

विजय कलीम ग्वालियर
कभी यूँ भी मोहब्बत का तमाशा देख लेते हैं
तमन्ना करके अंजामे तमन्ना देख लेते हैं

सुलेमान मजाज़, कोरवाई
तमाशा बनके रह जाती ये दुनिया
अगर कुछ लोग संजीदा न होते

आरिफ़ अली आरिफ़, भोपाल
नफ़रतें आरिफ़ ज़्यादा देर तक रहती नहीं
आख़िरश ज़िन्दा रहेगा भाई चारा देखना

इरफ़ान झांसवी, जबलपुर
तन्हाई कर रही है मिरा घर में इंतज़ार
अब रात हो गई मुझे घर जाना चाहिए

दीपशिखा सागर, छिंदवाड़ा
वो उधर ले गया तमाम गुलाब
हम इधर काश काश करते रहे

साजिद हाशमी, राजगढ़
उस नज़र की नज़र उतारी है
जिस नज़र पे नज़र तुम्हारी है

सरवत ज़ैदी, भोपाल
हिन्दी भी हम सफ़र है मोहब्बत की राह में
उर्दू कभी वतन में अकेली नहीं रही

दीपक जैन, गुना
ढलती धूप भी आख़िर धूप ही होती है
लेकिन धूप का ग़ुस्सा कम हो जाता है

सबीहा सदफ़, रायसेन
मोहब्बत भाई चारे दोस्तां की बात करते हैं
कि हम फ़ख़्रे जहां हिन्दुस्तां की बात करते हैं

ज्योति आज़ाद खत्री, ग्वालियर
मैं अपनी आँखों से दुनिया को जीत लाऊँगी
तू मेरे पाँव की ज़ंजीर देखते रहना

धीरेंद्र सिंह फ़ैयाज़, खजुराहो
आदमी आदमी के बस में नहीं
अब तो कोई किसी के बस में नहीं

कुलदीप कुमार, उमरिया
दरख़्त करते नहीं इसलिए उमीद-ए-वफ़ा
वो जानते हैं परिन्दों के पर निकलते हैं

फ़रहान मंज़र, भोपाल
जहां पहुंचे फले फूले रहे आबाद हर दिल में
ये उर्दू है तो ज़िन्दा है जहाँ में शायरी अपनी

फ़ाज़िल फ़ैज़, भोपाल
वो ख़ुद ही फिर जहां के लिए हो गया मिसाल
जिसने किसी मिसाल से आगे की बात की

नौमान ग़ाज़ी, भोपाल
उसको तो बस दो ही चीज़ें हैं पसन्द
शर्ट मेरी आसमानी और मैं

छाया संगीत का जादू
तृतीय सत्र में सांगीतिक सभा के अंतर्गत सलीम अल्लाह वाले ने अपनी ग़ज़लें पेश कर समाँ बांधा। इसके बाद देश विदेश में अपने फ़न का लोहा मनवाने वाले इंदौर के क़व्वाल आफ़ताब क़ादरी ने क़व्वाली पेश करके श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने मेरे भारत जैसा कोई देश नहीं…. कोई हद है उनके उरूज की… ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा, जैसे कलाम पर खूब दाद बटोरी। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन मुमताज़ ख़ान ने किया।

6 जनवरी के कार्यक्रम
=दोपहर 2:30 बजे
संवाद – वक्ता 
मनोज श्रीवास्तव भोपाल
डॉ मो. नौमान ख़ान भोपाल
अब्बास रज़ा नैयर लखनऊ
डॉ मोहम्मद आज़म भोपाल

=द्वितीय सत्र- शाम 3:30 बजे
रंग मोहल्ला सोसायटी फॉर परफॉर्मिंग आर्ट संस्था द्वारा
मिर्ज़ा ग़ालिब और सिनेमा का इश्क़ (एकल अभिनय) की प्रस्तुति। इसका निर्देशन अदनान खान ने किया है।

=शाम 4:30 बजे
व्याख्यान और काव्यगोष्ठी
विषय- भारतीय दर्शन और ग़ालिब

=समापन सत्र
शाम 5:30
धर्मेन्द्र भाव सिंह लोधी
मंत्री, संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक एवं धर्मस्व विभाग मध्यप्रदेश द्वारा पुरस्कार वितरण।

=शाम 7:30 बजे
रक़्स ए रास (सूफ़ी नृत्य में एकत्वबोध)
कलाकार – शिंजिनी कुलकर्णी एवं दल मुंबई

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