इनका वक्फ से रहा है लंबा नाता
खान आशु
भोपाल। जिस थाली में खाना, उसी में छेद… कहावत चरितार्थ करते हुए एक पूर्व सरकारी अधिकारी केंद्र सरकार के एक फैसले को चुनौती देने में जुटे हुए हैं। बरसों वक्फ बोर्ड रहे, एक एक कर दो बोर्ड अध्यक्ष बनवाने में महती भूमिका निभा चुके हैं और अब भी पिछले दरवाजे से वक्फ बोर्ड में ही अघोषित सेवाएं दे रहे हैं। अब इन्होंने केंद्र सरकार के वक्फ संशोधन बिल को रिजेक्ट करने की मुहिम में बढ़चढकर हिस्सा लेना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे “बिल रिजेक्शन” मुहिम के मैसेज लोगों को भेजकर यह इस अभियान में शामिल होने की अपील कर रहे हैं।
नाम है दाऊद अहमद खान। लंबे समय तिलहन संघ की सेवा इन्होंने की। जब यह विभाग विघटित हुआ तो दाऊद अहमद अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के तत्कालीन पीएस स्व जब्बार ढाकवाला के सहयोग से अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में पहुंच गए। शुरुआती पोस्टिंग मप्र वक्फ बोर्ड में मिली। मप्र राज्य हज कमेटी का अतिरिक्त प्रभार भी उन्हें मिल गया। वक्फ बोर्ड में पदस्थ रहते हुए उन्होंने तत्कालीन विभागीय मंत्री अजय विश्नोई की पसंद के अध्यक्ष को पद पर आसीन कराने में जुट गए। इसके लिए उन्होंने जिला मुतावल्ली कमेटी के प्रभावशाली नियमों में भी कई परिवर्तन कर दिए।

प्रयास यहां तक जारी
सूत्रों का कहना है कि मप्र वक्फ बोर्ड के वर्तमान बोर्ड के गठन में आईं कानूनी मुश्किलों को दूर करने की जिम्मेदारी भी दाऊद अहमद ने ही निभाई हैं। इसी कड़ी को मजबूत करने के लिए उन्होंने रिटायर होने के बाद भी बोर्ड चुनाव के लिए रिटर्निंग ऑफिसर बनने की जुगत लगा ली थी। लेकिन बाद में अदालत के हस्तक्षेप से उन्हें इस जिम्मेदारी से मुक्त होना पड़ा था। सूत्रों का कहना है कि वक्फ बोर्ड के अनुभव और नियमों से खेलने की कला के चलते उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष डॉ सनव्वर पटेल की ताजपोशी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कई मामलों के घेरे में
जानकारी के मुताबिक मप्र वक्फ बोर्ड में सीईओ रहते हुए दाऊद अहमद खान ने कई नियमविरुद्ध कामों को संधारित किया है। जिसके चलते उनके खिलाफ कई विभागीय जांचें प्रचलन में हैं। इसके अलावा लोकायुक्त से लेकर कई अदालती मामले भी उनसे जुड़े हुए हैं।
काम अब भी बोर्ड का
सूत्रों का कहना है कि सरकारी नौकरी से निवृत्त होने के बाद भी दाऊद अहमद की अब भी मप्र वक्फ बोर्ड कार्यालय में बदस्तूर हाजिरी जारी है। यहां वे किस अधिकार से पहुंच रहे हैं और सरकारी फाइलों को किस नियम के तहत मूवमेंट दे रहे हैं, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि दाऊद की बोर्ड दौड़ महज अपने पुराने मामलों को सम्मानजनक खात्मे की कोशिश के लिए है। इसके बदले वे बोर्ड को नियमों से खेलने की कला सिखा रहे हैं।
और साथ यह मुहिम भी
केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को लेकर सियासी और सामाजिक घमासान मचा हुआ है। इसको लेकर एक कमेटी गठित की है। कमेटी ने बिल के पक्ष और विरोध में आमजन से उनके विचार, मत और सुझाव मांगे हैं। इन सुझाव और मत के आधार पर ही जेपीसी अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। जिससे बिल को लागू करने या न करने का बल मिलने वाला है। इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए अलग अलग लोगों, संस्थाओं, संगठनों द्वारा अपील की जा रही हैं। रिटायर्ड शासकीय अधिकारी और वर्तमान में मप्र वक्फ बोर्ड में अघोषित सेवाएं दे रहे दाऊद अहमद खान ने भी खुद को “रिजेक्ट बिल” अभियान से जोड़ लिया है। वे सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर इससे संबंधित मैसेज भेज रहे हैं। इन मैसेज के मार्फत लोगों से ई मेल, व्हाट्स ऐप और अन्य माध्यम से बिल का विरोध करने की अपील दाऊद अहमद खान द्वारा की जा रही है !
