प्रकृति का अपनापन या जीवन अस्तित्व…

जी बिल्कुल, पर्यावरण के हालातों की चर्चा के साथ पूछेंगे अपनी जिम्मेदारी से अहम फर्ज़ के सवाल …

        कि निभा रहें है या नहीं ? 

 

प्राण यानी कि प्रकृति के अस्तित्व से जन्मा “जीवन” जो धरती की गोद में अपने अस्तित्व को बड़ा करता है, जिसे वह सब कुछ मिलता है, जो उसकी जरूरत होती है फिर वो जीवन किसी भी रूप में क्यों न हो, अगर माने पौधो में तो उसे वह पोषण मिलता है जिससे वह वृक्ष के रूप में निर्भर “जीवन” यानी कि जीव – जंतु और मनुष्य को दे पाए।

प्रकृति के गर्भ में वह सब कुछ मिलता है जो सृष्टि की आवश्यकता है, और प्रकृति हमें दोहन करने से मना नही करती, लेकिन ये भी नहीं कहती कि उसका दुरुपयोग हो, जिससे मानवीय मूल्यों की उपेक्षा नही बल्कि अपेक्षा हो और न ही सृष्टि की निरंतर गति में कोई बाधा उत्पन्न हो, जीवन में पर्यावरण उपयोगी है तो उसका संरक्षण हमारी एक जिम्मेदारी है।

हमारी संस्कृति में एक सूत्र के रूप में बहुत अच्छे से मिलता है कि-   

 सङ्गतं खलु शाश्वतम्।

                            वारि-वायु-व्योम 

                            वह्नि-ज्या-गतम्। 

अर्थात् “प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध शाश्वत है।” 

जीवन अगर जीना है तो परस्पर हम उपयोगी बने, मनुष्य अगर प्रकृति का दोहन करता है तो पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने के लिए उसका पूर्णतः स्वरूप फिर से बने वो प्रतिबद्धता सिर्फ मनुष्य की है,

क्योंकि प्रकृति अपना विकास सदैव ही करती है और मनुष्य हमेशा उसका उपयोग व दोहन करता है।

हमें सोचने की आवश्यकता है कि प्रकृति शुद्ध है, हमें शोध उतना ही करना है जो ज्ञान बन सके, जिससे हम प्रकृति को वापस करने का प्रयास कर पाए।

ना कि ये भूल जाए जो शोधन-संयंत्र से हम कुछ अगर अविष्कार करके दे रहे है, तो हम उसके अधिकारी है।

हमारी वैदिक संस्कृति कहती है कि

प्रकृतिः पंचभूतानि ग्रहलोकस्वरास्तथा

             दिशः कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वंतु मंगलम्‌।

यानी कि – “पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश एवं ग्रह – मंगल, बुध, शुक्र आदि और संगीत के सातों सुर, दसों दिशाएं और भूत, वर्तमान और भविष्य समस्त कालों में सदैव कल्याणकारी हों।”

प्रकृति से मानव का रिश्ता बड़ा अनोखा है साहब, कभी उसको अपनापन के एहसास से जीने की कोशिश करके देखो… उसको अपना हिस्सा मानो… उसका ख्याल एक नन्हें बच्चे के कोमल रूप के जैसा देखो… आपको अपना अस्तित्व ही नजर ही दिखाई देगा….

क्योंकि प्रकृति तब भी थी, जब आप नहीं थे, वो तब भी अपना पोषण, अपना ख्याल रखती थी, जब आप उसका उपभोग कर लेते थे और है, वो अपनी रिक्तता को भरती थी और है.. साहब, उसके लिए जिसमे प्राण है यानी आपके लिए।

प्रकृति हम पर निर्भर नहीं बल्कि इस धरती पर जो जीवन का बीज बोआ जाएगा प्रकृति अपने गर्भ से उसका पालन पोषण करेगी ही।

अगर आज हम विश्व के पटल पर हम अपने देश की बात करते है तो हमें हमेशा याद रहे कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अजन्मा है और इस धरती पर जन्म लेना हमारा सौभाग्य है,

क्योंकि हमारे ऋषि – मनीषी बल्कि हमारे पूर्वज जो हमारे लिए सजोकर चले गए और हमें विरासत में देकर गए कि – हम भी इस पर ही निर्भर थे, जो तुम भी हो और आने वाली पीढ़ी भी।

सही मायने में सौभाग्यशाली ही है, जहां प्रकृति हमारा पालन पोषण करती है, तो वहीं भारतीय संस्कृति व वेद- वेदांत उत्तरदायित्व के रूप में कहता है कि –

 “माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:”

इसलिए भूमि पुत्र के नाते अपने दायित्व का बोध कराता है कि प्रकृति का उपयोग और संरक्षण के प्रति नैतिक कर्तव्य है, जो मानवीय सरोकार के अस्तित्व को जन्म देता है, ना कि पाश्चात्य संस्कृति जो प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य जमाना, उपभोग करना और दोहन करने वाली सोच और जिसका परिणाम प्रकृति तय करती है और परिणाम होता है प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला “विनाश” ।

दोस्तों अगर हम अपने वर्तमान को एक नन्हें पौधे को जीवन देने का, जल का संरक्षण करने का एवं पर्यावरण को शुद्ध रखने की जिम्मेदारी आज निभा लेंगे तो हम आने वाली पीढ़ी के जीने की चिंता से मुक्त हो जायेंगे जो भविष्य के गर्भ में है !                                                  – अंशुमान शुक्ल “अंश

प्रहरी व युवा लेखक anshumanshukla8@gmail.com

आंगनवाड़ी केन्द्रों में आगामी 1 से 15 जून तक 15 दिवसीय ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया गया।

जीतेन्द्र सेन 

भोपाल।। मध्य प्रदेश के आंगनबाड़ी केंद्रों में 1 जून 2025 से 15 जून 2025 तक 15 दिवसीय ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया गया है यह अवकाश आंगनवाड़ी केन्द्रों में नियमित रूप से आने वाले 3 से 6 आयु वर्ग के बच्चों एवं अन्य हितग्राहियों के लिए होगा।आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका की उपस्थिति इस अवधि में अनिवार्य रहेगी।

महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, यह अवधि आंगनवाड़ी केन्द्रों के रख-रखाव, दस्तावेज संधारण, वार्षिक सर्वेक्षण तथा पोषण संबंधित गतिविधियों के लिए निर्धारित की गई है। इस दौरान केन्द्रों में बच्चों के लिए नाश्ता एवं गर्म पका भोजन के स्थान पर रेडी टू ईट (RTE) भोज्य पदार्थ महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा वितरित किया जाएगा।

 

*अवकाश अवधि में आंगनवाड़ी होंगी व्यवस्थित*

 

केन्द्रों की साफ-सफाई और मरम्मत: भवन की सफाई, खेल सामग्री की व्यवस्था, रसोई व शौचालय की मरम्मत तथा पेयजल की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।इसके अतिरिक्त रिकॉर्ड संधारण का कार्य किया जाएगा ।सम्पूर्ण उपकरणों एवं फर्नीचर का स्टॉक पंजीकरण, टेक होम राशन वितरण का विवरण, संपर्क एप्लिकेशन में डाटा अपलोडिंग की जायेगी।इस अवधि में वार्षिक सर्वेक्षण (AASR) भी किया जाएगा ।एक से 10 जून तक परिवार सर्वेक्षण एवं हितग्राही पहचान की जाएगी, जबकि 10 से 15 जून के मध्य अधिकारियों द्वारा समीक्षा की जाएगी।

पोषण वाटिका की तैयारी : बाउंड्रीवॉल युक्त केन्द्रों और कुपोषित बच्चों के घरों में पोषण वाटिका हेतु क्यारियाँ तैयार की जाएंगी। बीज व पौधों की व्यवस्था हेतु पंचायत से समन्वय किया जाएगा। स्वास्थ्य और पोषण परामर्श: टीकाकरण, C-MAM कार्यक्रम की निगरानी, पोषण परामर्श और गृह भेंट के माध्यम से कुपोषित बच्चों एवं महिलाओं तक सेवाएँ पहुंचाई जाएंगी। बाल विकास परियोजना अधिकारी एवं पर्यवेक्षकगण इस अवधि में दूरस्थ व सहयोग की आवश्यकता वाले केन्द्रों पर विशेष ध्यान देते हुए निरंतर निगरानी करेंगे। 16 जून 2025 को पुनः केन्द्रों में बच्चों एवं महिलाओं के स्वागत के साथ नियमित गतिविधियाँ प्रारंभ होंगी।

दिया जाएगा प्रशिक्षण, सिखाई जाएगी भाषा, क्योंकि यह है हमारी विरासत

भोपाल। संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय म.प्र. भोपाल द्वारा भारत में विलुप्त होती जा रही मोडी लिपि/भाषा के प्रति जन-सामान्य में जागरति लाने के उद्देश्य से 2 से 13 जून, 2025 तक मोडी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यशाला में महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार, मुम्बई से दो मोडी लिपि विशेषज्ञों को प्रशिक्षण देने हेतु आमंत्रित किया गया है। यह प्रशिक्षण कार्यशाला 2 से 13 जून, 2025 तक प्रतिदिन प्रातः 10 से सायं 05 बजे तक प्रशासन अकादमी, शाहपुरा, भोपाल में आयोजित की जायेगी।

प्रशिक्षण कार्यशाला में भाग लेने हेतु इच्छुक प्रशिक्षणार्थी दिनांक 30/05/2025 सायं 05:00 तक इस कार्यालय के पुरालेख अधिकारी पदम सिंह मीणा मो.नं. 9893571538 से संपर्क कर अपना पंजीयन करा सकते हैं।

मोडी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला में भाग लेने वाले समस्त प्रशिक्षणार्थियों को विभाग की ओर से प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र प्रदान किया जायेगा।

कार्यवाहक निरीक्षक वीरेंद्र सेन बने बैरसिया थाने के नए प्रभारी।

ईमानदारी सेवाभाव और अनुभव के आधार पर मिली अहम जिम्मेदारी

जीतेन्द्र सेन

बैरसिया।। क्षेत्र की कानून व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कार्यवाहक निरीक्षक वीरेंद्र सेन को बैरसिया थाना प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति एक प्रशासनिक निर्णय के तहत हुई है, जिसमें उनके पिछले कार्यकाल की ईमानदारी सेवाभाव और अनुशासित सेवाओं को प्रमुख रूप से आधार बनाया गया है।

आपको बता दें कि वीरेंद्र सेन ने पूर्व में कई महत्वपूर्ण थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं और हर स्थान पर अपने कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता का परिचय दिया है। उनके कार्य करने की शैली सरल सहज,और आमजनो के हित में मानी जाती है। यही वजह है कि वे न केवल विभागीय अधिकारियों में,बल्कि आमजनो के बीच भी एक भरोसेमंद पुलिस अधिकारी के रूप में पहचान रखते हैं। उनकी नियुक्ति में प्रशासन द्वारा कानून व्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधानों का हवाला दिया गया है, ताकि बैरसिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में कानून व्यवस्था को और अधिक सशक्त किया जा सके। बैरसिया क्षेत्र के लिए यह नियुक्ति एक सकारात्मक संदेश लेकर आई है आम नागरिकों को उम्मीद है कि वीरेंद्र सेन के नेतृत्व में पुलिस प्रशासन और भी अधिक प्रभावी और संवेदनशील होगा

भोपाल कलेक्टर जनसुनवाई में ग्रामीण जनों ने पटवारी पर लगाए भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप ,पटवारी को हटाने की मांग।

बैरसिया में आज भी ग्रह तहसील में कई वर्षों से फेविकोल की तरह चिपके पटवारी सांसद की मांग भी हुई फुस्स।

जीतेन्द्र सेन 

बैरसिया। लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार के मामलो से आम जनता काफी परेशान है ऐसा ही मामला राजधानी भोपाल जिले की बैरसिया तहसील के पटवारी हल्का नंम्बर 46 पर लंबे समय से पदस्थ हीरालाल मेहर के विरुद्ध मंगलवार 27 मई 2025 की जनसुनवाई में गांव सागोनी कला एव गरेटिया दांगी के करीब दो दर्जन से अधिक किसानों ने भोपाल कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह के नाम शिकायती पत्र देते हुए हल्का पटवारी पर बगैर पैसा लिए कोई काम न करने का आरोप लगाते हुए स्थानांतरण करने की मांग की। जिसमें कृषक लाखन सिह दांगी एव राम कन्हैया अहिरवार ने बताया कि पटवारी हीरालाल मेहर छह सात वर्षों से इसी हल्के में पदस्थ है,ओर पटवारी का मूल निवास कार्यक्षेत्र से मात्र 8 किलोमीटर दूर है। स्थानीय होने की बजह से पटवारी का गरीब किसानों के प्रति रवैया ठीक नही है। इस कारण किसानों के आवश्यक राजस्व सम्बंधी कई काम काज नही हो पा रहे हैं। ग्रामीणों ने शिकायत में लिखा है कि पटवारी हीरालाल मेहर का रवैया गैर-जवाबदेह और भ्रष्टाचार पूर्ण है, इससे आम नागरिको ओर किसानो को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पटवारी हल्का के कई किसान पूर्व में भी पटवारी की घूसखोरी से परेशान हो खंड स्तरीय जनसुनवाई सहित सीएम हेल्पलाइन में शिकायते हो चुकी है। जनसुनवाई में दिए शिकायत पत्र पर सरपंच नरेंद्र प्रसाद किल्लोर , उपसरपंच दौलत सिह , रामचरण , शिवराज , मनोज , मनमोहन दांगी , लोकेश किल्लोरे शिवराम , जगदीश , लखन सिह , सुमेर सिह , धनवीर सिह आदि कृषकों के हस्ताक्षर युक्त दिया है। कलेक्टर ने पटवारी की जांच के निर्देश दिए हैं।

ग्रामीणों द्वारा कलेक्टर को जनसुनवाई में दिया गया आवेदन

सांसद के ऑब्जेक्शन के बाद भी नहीं हुई कोई कार्यवाही 

बीते समय में भोपाल सांसद आलोक शर्मा द्वारा प्रभारी मंत्री की पहली मीटिंग में कई वर्षों से 1 हीं हल्के में जमे पटवारीयों के हल्के बदलने को लेकर आवाज़ उठाई थीं मगर भोपाल शहर में हीं उनकी आवाज़ दबती हुई नजर आ रहीं है और आज भी इसी राजधानी में अनगिनत पटवारी ग्रह तहसीलों में पदस्थ है और कई वर्षों से एक हीं जगह जमे हुए है जमकर आम व्यक्ति से काम के बदले मोटी रकम एठने के आरोप खा रहें है !

अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया ‘म्यूजियम मेला’ का शुभारंभ

राज्य संग्रहालय, भोपाल में सप्ताहव्यापी आयोजन; वर्चुअल रियलिटी केंद्र, 11 पुस्तकों और विभागीय मैस्कॉट ‘वाकन दादा’ का लोकार्पण

भोपाल : अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस (18 मई) के अवसर पर संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश द्वारा भोपाल स्थित राज्य संग्रहालय परिसर, श्यामला हिल्स में सप्ताहव्यापी ‘संग्रहालय मेला’ का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे और उन्होंने मेले का शुभारंभ किया।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि “भारतीय पुरातत्त्व ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। देश अपनी जड़ों को सहेजते हुए आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। एक सिक्के को देखकर इतिहास बताने की क्षमता रखने वाले पुरातत्वविदों का कार्य अद्भुत है।” उन्होंने डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर से अपनी भेंट का स्मरण करते हुए उनकी ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया और संचालनालय द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा की। मुख्यमंत्री ने राज्य संग्रहालय परिसर में वर्चुअल रियलिटी अनुभव का अवलोकन किया और आमजन से आग्रह किया कि वे इस मेला अवश्य देखने आएं।

इस अवसर पर संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव श्री शिव शेखर शुक्ला ने कहा कि UNESCO की एक चौथाई साईट मध्यप्रदेश में स्थित हैं और आने वाले समय में और भी कई स्थल विश्व धरोहर सूची में शामिल हो सकते हैं। मध्यप्रदेश की विरासत अत्यंत समृद्ध है — इसमें 3000 वर्ष पुराने गुफाये, दुर्लभ प्रतिमाएं, मंदिर, स्मारक आदि सम्मिलित हैं। संचालनालय द्वारा इनकी संरक्षण एवं जनसुलभता की दिशा में किए जा रहे प्रयास अत्यंत प्रशंसनीय हैं। उन्होंने लालबाग, राजवाड़ा, उज्जैन सहित अनेक स्थलों पर चल रहे संरक्षण कार्यों की जानकारी भी दी।

इस अवसर पर मध्यप्रदेश में प्रथम बार वर्चुअल रियलिटी केंद्र का शुभारंभ किया गया। यह केंद्र आगंतुकों को बिना किसी फिजिकल गाइड के संग्रहालय/स्मारक की गहन यात्रा का इमर्सिव अनुभव प्रदान करता है। वर्तमान में यह केंद्र ओरछा एवं राज्य संग्रहालय भोपाल में स्थापित किया गया है, जिसमें भविष्य में अन्य ऐतिहासिक स्थलों को भी जोड़ा जाएगा।

कार्यक्रम का एक विशेष आकर्षण ‘भारत की सौर परंपरा’ पर आधारित छायाचित्र प्रदर्शनी रही, जिसमें देश के प्रमुख सूर्य मंदिरों एवं उनसे संबंधित कलात्मक मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया। यह प्रदर्शनी प्रतिदिन प्रातः 10:30 बजे से सायं 5:30 बजे तक आमजन के लिए निःशुल्क खुली रहेगी।

मेले में विभाग की विभिन्न इकाइयों द्वारा कुल 9 स्टॉल लगाए गए, जिनमें जनसामान्य को संग्रहालय एवं पुरातत्त्व से जोड़ने की दिशा में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी गई। डिजिटाइजेशन स्टॉल में 6.88 करोड़ अभिलेखीय दस्तावेजों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को प्रदर्शित किया गया, जहाँ मशीनों के माध्यम से यह प्रक्रिया लाइव दिखाई गई। 3डी प्रिंटिंग स्टॉल में मूर्तियों की प्रतिकृतियाँ बनाने की तकनीक का प्रदर्शन किया गया, जो संग्रहालयों में प्रदर्शित की जाती हैं। वीआर स्टॉल में इमर्सिव अनुभव प्रदान किया गया। पी.आर. स्टॉल में संचालनालय की वैश्विक स्तर पर हो रही प्रशंसा और पहलों को दर्शाया गया। मॉडलिंग के स्टॉल में प्रतिकृति निर्माण की प्रत्यक्ष निर्मित का जीवंत प्रदर्शन किया गया। संरक्षण स्टॉल में संरक्षण कार्यों में प्रयुक्त औजारों एवं तकनीकों की जानकारी दी गई। इसके अतिरिक्त विभाग के प्रकाशन अनुभाग की जानकारी हेतु भी विशेष स्टॉल स्थापित किया गया।

इस अवसर पर विभाग द्वारा प्रकाशित पुरातात्त्विक 11 पुस्तकों का विमोचन भी किया गया, साथ ही विभाग के अधिकृत मैस्कॉट ‘वाकण दादा’ का लोकार्पण हुआ, जो विभागीय पहलों का चेहरा बनकर आमजन से संवाद करेगा।

प्रदेश के अन्य क्षेत्रीय कार्यालयों में भी अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस को विशेष रूप से मनाया गया। जिसमे ग्वालियर के मोती महल में ‘अतीत से भविष्य के सेतु: हमारे संग्रहालय’ विषय पर व्याख्यानमाला आयोजित की गई, जिसमें ख्यात विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इंदौर में ‘विंटेज इंदौर’ विषय पर प्रदर्शनी एवं संगोष्ठी आयोजित की गई। जबलपुर में ‘कृषि संस्कृति में बलराम’ विषय पर आधारित प्रदर्शनी एवं व्याख्यानमाला आयोजित की गई।

यह आयोजन संचालनालय पुरातत्त्व द्वारा इतिहास, कला एवं संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने और मध्यप्रदेश की समृद्ध विरासत को जन-जन तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। संग्रहालयों की ओर जनसामान्य को आकर्षित करने के उद्देश्य से यह मेला सभी आयु एवं वर्ग के लोगों के लिए एक अनूठा और अविस्मरणीय अनुभव सिद्ध हो रहा है।

अपना भोपाल : तालाब, पहाड़ियों, सुंदर वादियों, मस्जिदों और तहजीब, तालीम का शहर

जो बात इस जगह, वह कहीं पर नहीं…

 

भोपाल। तहज़ीब, तालीम, तरक्क़ी और तासीर का शहर दुआ है कि गंगा-जमुनी तहज़ीब को कभी कोई बुरी नज़र न लगे और इसकी खूबसूरती बनी रहे 

 ताहिर अली

यदि मंदिरों से घंटियों की मधुर आवाज़ और मस्जिदों से बुलंद अज़ान एक साथ गूंजे, तो समझ लीजिए आप उस शहर में हैं, जहाँ सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब ने अपने खूबसूरत रंग बिखेरे हैं। यह शहर है भोपाल – झीलों की नगरी, नवाबी संस्कृति की परछाईं, प्राकृतिक सौंदर्य की मिसाल और ऐतिहासिक धरोहरों का सजीव संग्रह।

तहज़ीब और भाईचारा

भोपाल की सबसे बड़ी खासियत इसकी साझा संस्कृति है। यहाँ तालाब के बीचों-बीच मंदिर, मस्जिद और मजारों का साथ-साथ दिखना आम बात है। यही वह शहर है, जहाँ सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक – ताजुल मस्जिद है, तो वहीं विश्व की सबसे छोटी मस्जिद मानी जाने वाली ‘ढाई सीढ़ी मस्जिद’ भी यहीं स्थित है। भोपाल में उर्दू भाषा का उपयोग लगभग सभी समुदाय के लोग करते हैं।

भोपाल की सड़कों पर चलते हुए अगर कोई राहगीर किसी मोहल्ले का पता पूछ ले, तो भोपाली उसे दरवाजे तक छोड़कर आते हैं। यही इसकी तहज़ीब है, यही इसकी पहचान है। भोपाल की एक बात ओर मशहूर है कि जो भी भोपाल आता है यहां के लोग उसे सीने से लगा लेते हैं। हिन्दुस्तान के किसी भी कोने से जो भोपाल आया जैसे नौकरीपेशा या कोई भी व्यवसाय के लिए यहीं का होकर रह गया। भेल कारखाना इसका जीता-जागता उदाहरण है। ज्यादातर नौकरी पेशा अधिकारी एवं कर्मचारी रिटायर होने के बाद भोपाल को ही अपना मानकर यहीं बस गए। काफी लोग कारोबार करने के उद्देश्य से यहीं आकर आबाद हो गये।

भोपाल की मज़ेदार ‘उर्फ़ियत’ – नाम के पीछे नाम की दुनिया!

भोपाल, भोपाली और भोपालियत की पहचान केवल ताल-ता‍लैया और ऐतिहासिक इमारतों आबोहवा, तहजीब और संस्‍क़ति तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी अनोखी और मज़ेदार ‘उर्फ़ियतों’ के लिए भी मशहूर है। जब किसी मोहल्ले में एक ही नाम के कई लोग हों, तो पहचान बनाने के लिए नाम के पीछे कुछ जोड़ना लाज़मी हो जाता है, फिर चाहे वो पहनावे से जुड़ा हो, बोलचाल से, शौक से या किसी मज़ेदार किस्से से – हर भोपाली को मिल जाता है उसका ख़ास “उर्फ़ी टाइटल”।

तो मिलिए भोपाल की इस अनोखी नामावली से –

तारिक़ टाई, जो हमेशा टाई में दिखते थे, तारिक़ चपटे, जिनके गाल खुद गवाही देते हैं, तारिक़ होंठ कटे, जिनके होंठों की कहानी हर गली जानती है, और तारिक़ झबरे, जिनकी आंखें ही उनकी पहचान हैं। आरिफ़ अंडे का नाश्ता शहर भर में मशहूर है, तो आरिफ़ बुलबुल अपने गले से सबको दीवाना बना देते हैं। बाबूलाल 501 नाम की सिगरेट की तरह मशहूर हैं, और सेठ छगनलाल, जिनका “सेठपना” मोहल्ले में आज भी कायम है।

रविंद्र सिंह लखरत, बाबूलाल लठमार, चांदमल हिटलर, मोहन पंचायती, लाला मुल्कराज, सरदारमल लालवानी, नाहर सिंह सूरमा भोपाली, कन्हैयालाल ‘बीड़ी’ और के. अमीनउद्दीन-301 तो अपनी शान और रसूख़ के लिए पहचाने जाते हैं। अखिलेश अग्रवाल गफूरे और वहीद अग्रवाल की उर्फ़ियतें उनकी दोस्ती और कारोबार की दास्तान सुनाती हैं। हफ़ीज़ पाजामे और चांद कटोरे का नाम सुनते ही भोपाल मुस्कुरा उठता है, वहीं चांद चुड़वे मोहल्ले की कहानियों के नायक हैं। सुरेश 501, अनिल अग्रवाल पटीये, और देवेश सिमहल वकील साहब अपने नाम से ही काफ़ी असरदार हैं। बाबू साहब घोड़े और बाबू साहब नाम की सादगी में गजब की शान है। आलू बड़े, ज़ायकों की दुनिया के हीरो हैं, और लोक सिंह ताल ठोंकू हर बहस में जीत की गारंटी हैं। रईस भूरा, मुन्ने मॉडल ग्राउंड, मुन्ने पेंटर, मुईन क़द्दे और माहिर मदीना – ये नाम जैसे ही कान में पड़ें, पूरा मोहल्ला मुस्करा उठता है।

भोपाल की गलियों में लोग नाम से कम और उर्फ़ियत से ज़्यादा जाने जाते हैं। जावेद चपटे और जावेद चिराटे जैसे नामों में मज़ाकिया तंज है, तो बन्ने पहलवान और बन्ने लखेरा में मोहल्ले की दो अलग-अलग शख्सियतें झलकती हैं। कल्लू अट्ठे, बाबू भड़भुजे, मुन्ने फुक्की, ईरानी और डूंड जैसे नाम रोज़मर्रा की आदतों, मज़ाक या पेशे से जुड़े हैं। सईद बुल, छुटकटे, वहीद ढेलकी, आरिफ पिस्स, और अनफिट भोपाल की उस खास तासीर को दर्शाते हैं, जहां हर नाम के पीछे एक किस्सा है — हँसी, अपनापन और तंज से भरा। यही भोपाल की असली पहचान है — उर्फ़ियतों में बसी यारी और यादें।

भोपाल की इन मज़ेदार उर्फ़ियतों में वो अपनापन है, जो किसी GPS में नहीं मिलता – सिर्फ मोहल्लों की यादों और बातों में ही जिंदा रहता है।

भोपाल में हिंदू-मुस्लिम एकता : सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की मिसाल

भोपाल की सांस्कृतिक विरासत की सबसे मजबूत कड़ी उसकी हिंदू-मुस्लिम एकता है, जो सिर्फ सामाजिक सौहार्द का प्रतीक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संघर्षों के बीच पनपी सहिष्णुता और साझेदारी की अनूठी मिसाल है। जब देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया, तब भी भोपाल ने अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को संजोए रखा। हर वर्ग के लोगों ने एक दूसरे से बहुत प्यार मोहब्बत के साथ दिली लगाव रखा। सन 1812 की लड़ाई में हिंदू योद्धाओं जैसे डांगर सिंह, जय सिंह, और अमन सिंह पटेल ने भोपाल की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां तक कि युद्ध में महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी की, यह दिखाते हुए कि भाईचारा केवल धार्मिक स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के स्तर पर भी जीवित था।

भोपाल रियासत के प्रशासन में हर कालखंड में हिंदुओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। दीवान (प्रधानमंत्री) जैसे उच्च पदों पर लाला घानी राम, लाला फूलानाथ, राजा अवध नारायण जैसे हिंदू अधिकारी रहे। यह समावेशिता केवल औपचारिक नहीं थी — ये अधिकारी नवाबों के विश्वासपात्र भी थे। नवाब क़ुदसिया बेग़म के दरबार में एक हिंदू, एक मुसलमान और एक ईसाई मंत्री नियुक्त थे — यह उस समय की धार्मिक विविधता के प्रति सम्मान का प्रतीक था।

रियासत के इंजिमाम (शामिल करने) के बाद शरीफ़ शरणार्थियों में (उच्च परिवार के शरणार्थी) सरदार गुरबख्श सिंह भी थे, जिनके बेटे अमरीक सिंह रंजीत होटल चलाते हैं। वे बहू मियाँ के साथ ईद पर नवाब साहब को सलाम करने जाते। एक बार नवाब साहब ने पूछा कि भोपाल कैसा लग रहा है, तो सरदार साहब ने हाथ जोड़कर कहा कि जहाँ गरीब परवर सरकार का साया हो, वहाँ कोई कैसे न खुश हो — यह कहते हुए वे भावुक हो गए।

धार्मिक सहिष्णुता के उदाहरण

नवाबों ने हिंदू नागरिकों और जागीरदारों के अधिकारों को बराबरी से सम्मान दिया। नवाब सुल्तान जहां बेग़म ने रंग पंचमी पर रंग और सावन के झूले जैसे हिंदू पर्वों में भाग लिया, और गरीब हिंदुओं के लिए “सदाव्रत” योजना शुरू की, जिसमें उन्हें भोजन और यात्राओं के लिए सामग्री दी जाती थी। हवा महल की दीवार इसलिए टेढ़ी बनाई गई क्योंकि पास के एक हिंदू नागरिक ने अपनी जमीन बेचने से इनकार किया था — सरकार ने उस निर्णय का सम्मान किया।

भोपाल में न कभी विशुद्ध मुस्लिम मोहल्ले रहे, न विशुद्ध हिंदू — सब एक साथ रहते थे। त्योहार, शादियाँ, दुःख-सुख सब साझे होते थे। इसी समरसता ने उर्दू भाषा के विकास को सहज वातावरण दिया। उर्दू न केवल दरबार की भाषा बनी, बल्कि आम जीवन की भाषा भी, जिसमें दोनों समुदायों ने योगदान दिया। भोपाल का इतिहास केवल एक रियासत की कहानी नहीं, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द, धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक सहभागिता का जीवंत दस्तावेज़ है। यह आज के भारत के लिए भी एक प्रेरणा है कि विभिन्न धार्मिक समुदाय कैसे सम्मान, सहयोग और साझा विरासत के आधार पर एक सशक्त समाज का निर्माण कर सकते हैं।

दिनों के नाम पर मोहल्लों के नाम

भोपाल की दिलचस्प रचनात्मकता इसके मोहल्लों के नामों में भी झलकती है – मंगलवारा, बुधवारा, इतवारा, जुमेराती, पीरगेट – इन मोहल्लों में किसी एक समुदाय की पहचान नहीं बल्कि पूरे शहर की साझी संस्कृति की झलक मिलती है। यही कारण है कि यहाँ के लोग आपदाओं में एक-दूसरे की मदद के लिए सबसे पहले खड़े नजर आते हैं।

शुजा ख़ां का अट्टा भोपाल की उन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गलियों में से एक है, जिसकी मिट्टी ने कई नामचीन और असरदार शख़्सियतों को जन्म दिया है। यूँ तो रियासत भोपाल में जुमेराती के काका मियाँ, इब्राहीमपुरा के तब्बू मियाँ और शफ़ीक़ पठान, लक्ष्मी टॉकीज़ के रफ़्फ़ू पहलवान, बुधवारा के डॉक्टर ज़हीरुलइस्लाम, इमामी गेट के हकीम अख़्तर आलम और सर्राफा चौक के मुन्नू लाल जोहरी जैसे कई मशहूर लोग गुज़रे हैं, मगर शुजा ख़ां का अट्टा की अपनी एक अलग ही तारीख़ है। यहाँ की सरज़मीन न केवल ज़रख़ेज़ रही है, बल्कि इसने समाज, अदब और कारोबार के कई सितारों को भी रौशन किया है। समय के साथ यह इलाका अब एक बड़ा कारोबारी केंद्र बन चुका है, जिसकी वजह से पुराने बाशिंदों के कई ख़ानदान सुकून की तलाश में शहर के अलग-अलग वीआईपी इलाकों में जाकर बस गए हैं। लेकिन इस मोहल्ले की रौनक कभी ज़हूर हाश्मी, शिक्षाविद डॉ. सैय्यद अशफ़ाक अली, खान शाकिर अली खान, शायर अख़्तर सईद ख़ां, नवाब मियाँ ‘सिगरेट’, मौलाना इमरान ख़ां, अल्लामा खालिद अंसारी, शर्की खालिदी और सालिक भोपाली जैसे रौशन चहरों से जगमगाया करती थी।

भोपाल का गुटका, बटुआ और नवाबी बटुए

एक ज़माना था जब भोपाल के गुटके की खासियत हर जगह मशहूर थी। ये वो गुटका नहीं, जो आज की तरह लोगों की जेब में रहता है, बल्कि ड्रायफ्रूट, रंग-बिरंगे मसालों और इत्र की सुगंध से तैयार होता था, जिसे खूबसूरत बटुओं में सजाकर पेश किया जाता था। भोपाल के ‘बटुए’ नवाबी शान की निशानी थे, और आज भी सर्राफा बाजार की कुछ दुकानों पर यह परंपरा जीवित है।

भाईचारे की कहानियाँ – रिश्तों की गर्मी

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां किसी एक विशेष समुदाय के मोहल्ले नहीं बल्कि सारे समुदाय समझदारी, भाईचारा और आपसी प्रेम के साथ एक साथ रहते हैं। किसी आपदा-विपदा में एक-दूसरे की मदद करते नजर आते हैं। मैं खुद भोपाल के इतवारा मोहल्ले का निवासी रहा हूँ। हमारे पुश्तैनी मकान के सामने साहू समाज का परिवार रहता था, जो आज भी हमारे दिल के बेहद करीब है। मेरी बहन ने इस परिवार को राखी बाँधी थी। मेरी बारात में ये परिवार हमारे साथ सीहोर तक गया, और जब 1977 में मेरी माताजी का निधन हुआ, तो पहली रसोई इन्हीं के घर से आई। आज भी हमारे सुख-दुख में वही आत्मीयता बरकरार है।

भोपाल: धर्मनिरपेक्ष पहचान का प्रतीक

भोपाल के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक, काली माता का मंदिर, छोटे तालाब क्षेत्र में स्थित है और एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है। वहीं एयरपोर्ट क्षेत्र में स्थित मनुआभान की टेकरी पर श्वेतांबर जैन समुदाय का एक प्रसिद्ध मंदिर है। अब इस टेकरी को महावीर गिरी के नाम से भी जाना जाने लगा है, जहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। बिड़ला मंदिर भोपाल का श्रद्धा का केंद्र है। चौक स्थित प्राचीन आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, बहुत मशहूर है। इसके साथ ही बिडला मंदिर सहित अनेक मंदिर आस्‍था के केन्‍द्र है।

भोपाल में सिख धर्म की उपस्थिति सुदीर्घ और प्रभावशाली रही है, जिसका प्रतीक हैं शहर के तीन प्रमुख ऐतिहासिक गुरुद्वारे – शाजहानाबाद, हमीदिया रोड और इदगाह हिल्स। शाजहानाबाद स्थित गुरुद्वारा नानकसर 19वीं सदी में स्थापित हुआ और आज भी गुरबाणी, संगत और लंगर की परंपराओं को जीवंत रखे हुए है। हमीदिया रोड का गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा शहर का प्रमुख धार्मिक व सामाजिक केंद्र है, जहाँ कीर्तन, शिक्षण शिविर और सामूहिक सेवाएं नियमित रूप से होती हैं। वहीं इदगाह हिल्स स्थित गुरुद्वारा गुरु नानक दरबार आध्यात्मिक शांति व प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल है, जहाँ पर्वों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं। ये तीनों गुरुद्वारे न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि सेवा, एकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की मिसाल भी पेश करते हैं।

भोपाल की सबसे पुरानी चर्चें शहर के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण हैं। सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी कैथेड्रल चर्च 150 वर्षों से अधिक पुराना है और नवाब सिकंदरजहां बेगम की अनुमति से ब्रिटिश काल में बना। इसकी वास्तुकला और शांति इसे प्रार्थना का प्रिय स्थल बनाते हैं। सेंट जोसेफ कैथोलिक चर्च एक शांत वातावरण वाला यह चर्च, भोपाल की सबसे पुरानी पूजा स्थलों में से है, जो सामुदायिक कार्यक्रमों और त्योहारों में सक्रिय भूमिका निभाता है। इन्फेंट जीसस चर्च की सुंदर वेदी और क्रिसमस के अवसर पर भव्य सजावट इसे विशेष बनाती है। यह धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। इन चर्चों की उपस्थिति भोपाल की सर्वधर्म समभाव की परंपरा को और मज़बूत बनाती है।

नवाबों की विरासत: ताजमहल से लेकर बाबे-ए-आली तक

भोपाल के ताज महल की इमारत, जिसे नवाब हमिदुल्ला खान ने पाकिस्तान से आए सिंधी शरणार्थियों को शरण देने के लिए समर्पित किया था, आज भी सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। भोपाल शहर के बीचों-बीच स्थित जामा मस्जिद हिंदू-मुस्लिम एकता की परिचायक है। गोलघर, गौहर महल, मिंटो हॉल, सदर मंजिल और बॉबे आली जैसी शानदार इमारतें अपनी खूबसूरती और भाईचारे की गवाह हैं। भोपाल में किसी जमाने में खवातीन (महिलाओं) के लिए घरेलू सामान की जबरदस्त प्रदर्शनी बाबे-ए-आली में लगा करती थीं। जिसमें शहर के बड़े ताजिर (व्यापारी) अपनी दुकानें प्रदर्शनी में लगाया करते थे। प्रदर्शनी में 10 साल से ज्यादा के पुरूषों को आने की अनुमति नहीं थीं। भोपाल के नबाव होली त्योहार के बाद रंगपंचमीं पर शहरवासियों के साथ मिलकर रंग खेलते थे। उस जमाने में शादियां मोहल्ले में शामीयाने लगा कर की जाती थी। भोपाल की पहचान उस दौर में खास सवारी तांगा से हुआ करती थी। शादी समारोह में शामिल होने आए मेहमानों का तांगा सवारी का किराया खुद अदा करते थे।

बरकतउल्ला भोपाली: आज़ादी की अलख जगाने वाला अज़ीम सपूत

भोपाल की सरज़मीं को यह फ़ख्र हासिल है कि यहाँ एक ऐसा जांबाज़ स्वतंत्रता सेनानी पैदा हुआ, जिसने अपनी पूरी जिंदगी भारत की आज़ादी के नाम कर दी। मौलाना मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली — एक ऐसा नाम, जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ज्वाला बनकर उभरा। कच्चे मकान में जन्मे इस अज़ीम शख्स ने दुनिया के 26 देशों में 45 सालों तक भटकते हुए स्वतंत्रता की मशाल को जलाए रखा। 1890 में जब वो इंग्लैंड पहुंचे, तो देखा कि एक ही साम्राज्य में एक देश (इंग्लैंड) सम्पन्न और दूसरा (भारत) बदहाल क्यों है? इस अन्याय के खिलाफ उन्होंने कलम और जुबान को हथियार बनाया। पेरिस में ‘अल-इंक़लाब’ के संपादक बने, जापान में ‘इस्लामिक फ्रेटरनिटी’ नामक अखबार शुरू किया, जर्मनी में लाला हरदयाल के साथ ‘ग़दर पार्टी’ की नींव रखी और अमेरिका में जाकर भारतीयों को एकजुट किया।

1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने रूस में क्रांतिकारी लेनिन से मुलाकात की, और गांधीजी के मार्गदर्शन में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के साथ मिलकर अफगानिस्तान में निर्वासित भारत सरकार की स्थापना की। इसमें बरकतउल्ला भोपाली को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। उनके नाम पर भोपाल में आज ‘बरकतउल्ला विश्वविद्यालय’ और ‘बरकतउल्ला भवन’ स्थापित हैं।

शायरों, हाकी खिलाड़ियों और पूर्व राष्ट्रपति की धरती

भोपाल ने देश को न केवल नामचीन शायर और लेखक दिए, बल्कि हॉकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। खपोटा लकड़ी से बनी हॉकी स्टिक लेकर इस शहर के खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया। यही भोपाल है जिसने डॉ. शंकर दयाल शर्मा को राष्ट्रपति पद तक पहुँचाया – यह हर भोपाली के लिए गर्व की बात है।

भोपाल का जिक्र करेंगे तो ओबेदुल्ला खां हाकी गोल्ड कप का उल्लेख होना भी जरूरी है, नहीं तो यह अधूरा माना जाएगा। ये टूर्नामेंट भोपाल में एक जश्न की तरह मनाया जाता था। भोपाली पूरे साल इस का इन्तेजार करते थे। हिदुस्तान के अलावा इन्टरनेशनल टीमें में भी इस टूर्नामेंट में भाग लेती थी। साइकिलों का दौर था हर साइकल सवार ऐशबाग स्टेडियम की तरफ नजर आता था।

यह जानना भी ज़रूरी है कि रियासत भोपाल की बेगम सुल्तान जहां के बेटे प्रिंस औबेदुल्ला ख़ान के नाम पर इस टूर्नामेंट की शुरुआत 1931-32 में हुई थी। यह भारत में हॉकी का सबसे पुराना हॉकी टूर्नामेंट माना जाता है। उस दौर में अकेले भोपाल में ही 65 हॉकी क्लब थे। वहीं रायसेन जिले का कस्बा ‘औबेदुल्लागंज’ भी प्रिंस औबेदुल्ला के नाम पर ही रखा गया है। एक ज़माने में भोपाल को ‘हॉकी की नर्सरी’ कहा जाता था।

भोपाल-नंबरों का शहर

वक्त के साथ भोपाल शहर बढ़ता गया, नई बसाहटों के नए-नए नाम आये। विस्तारित हुए शहर भोपाल के इलाकों की शिनाख्त नंबरों से भी होती है। सबसे पहले आता है 1250, मतलब जिला अस्पताल जयप्रकाश चिकित्सालय, जिसे ज्यादातर लोग 1250 या जेपी अस्पताल कहते हैं। अस्पताल का नामकरण इस इलाके में बने 1250 सरकारी आवासों से है। आवास और अस्पताल दोनों 1250 के नाम से जाने जाते हैं। करीब ही सेकेंड है, यानी कभी यहां सिटी बस को दो नंबर स्टॉपेज हुआ करता है। हालांकि, इलाके का असली नाम तुलसीनगर है। सेकंड से आगे बढ़े तो मालूम नहीं क्यों तीन व चार ग़ायब हैं और सीधे पांच नंबर इलाका और पांच नंबर मार्केट। असलियत में ये शिवाजी नगर इलाके का हिस्सा है। पांच के बाद छह नंबर भी शिवाजी नगर का ही हिस्सा है। इतना ही नहीं मिनी बस वालों और यात्रियों की सहूलियत के लिये छह नंबर और सात नंबर स्टॉप के बीच सवा छह और साढ़े छह भी हैं। इन इलाकों में रहने वाले खुद के पते के बारे में यही बताते हैं। सात नंबर के बाद आठ नंबर स्टॉप को आठ नंबर कम रविशंकर मार्केट के नाम से ही जाना जाता है। यहां के वाणिज्यिक इलाके को नौ नंबर के नाम से जाना जाता है। आगे 10 और 11 नंबर के बीच साढ़े 10 नंबर भी पता बन चुका है। इसके बाद 11 नंबर और उससे बायीं तरफ 1100 आ गया। यहां भी इलाके की पहचान 1100 सरकारी क्वार्टर्स की वजह से है। वापस बस स्टॉप की रवायत में आएं तो 11 नंबर से आगे बढ़े तो 12 नंबर, और इसी लिये भोपाल के नए शहर के पीडब्ल्युडी दफ्तर के भवन को 12 नंबर दफ्तर के नाम से जाना जाता है। नंबरों वाला होने में शहर के सबसे ज्यादा पॉश इलाके भी पीछे नहीं हैं। चार इमली, 74 बंगले और 45 बंगले हैं। जहां संतरी से मंत्री तक और बाबू से सबसे बड़े बाबू (आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अफसर) के साथ ही राज्य शासन के दूसरे अफसर रहते हैं। चार इमली के बारे में शहर के बुज़ुर्ग बताते हैं कि जब भोपाल राजधानी नहीं था तब यहां घना जंगल था और इमली के चार बड़े पेड़ थे। पैंतालीस और चौहत्तर बंगले भी बंगलों की संख्या के कारण बने। अब शहर का प्रसार निरंतर हो रहा है। नित-नए इलाके प्रकट हो रहे हैं। अब भोपाल शहर पूंछ की तरफ बढ़ रहा है। पूंछ में शामिल हो रहे हैं होशंगाबाद रोड एनएच-12 के दोनों तरफ के आर्केड, पैलेस, विला, विहार और पुरम। नई कॉलोनियों की बसाहट भोजपुर की ओर जाने वाले मोड़ तक पहुंच गई है। भोपाल की लंबी होती पूंछ की फिलवक्त लंबाई मील में है, लिहाजा इसे 11 मील कहते हैं।

आधुनिक भोपाल की ओर: स्मार्ट सिटी की उड़ान

वर्तमान में भोपाल एक स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित हो रहा है। ओवरब्रिज, स्मार्ट रोड, मेट्रो रेल जैसे प्रोजेक्ट्स पुराने शहर को नए शहर से जोड़ रहे हैं। एयरपोर्ट अब भी विशेष सेवाओं के लिए कार्यरत है और पुराने दौर की ‘पुतली घर’ नामक कपड़ा मिल की मीनार आज भी इतिहास की गवाही देती है।

दुआओं में बसा है मेरा भोपाल

मेरे अतीत के झरोखे से कुछ यादगार पल जो मैंने आज भी अपनी यादों में संजोकर रखे हैं। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि 71 वर्ष की उम्र में आज भी भोपाल की इस संस्कृति, भाईचारे और शांति से जुड़ा हूँ। यही दुआ करता हूँ कि यह शहर सदा यूं ही फले-फूले, इसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब को कभी कोई बुरी नज़र न लगे और इसकी खूबसूरती बनी रहे।

 

(लेखक जनसंपर्क संचालनालय, मप्र शासन के सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक हैं)।

सीएम डॉ. यादव करेंगे भोपाल में प्रदर्शनी का आगाज

अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर पुरातत्व विभाग का आयोजन

भोपाल। अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर राजधानी भोपाल में एक दिवसीय छाया चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा। संचालनालय पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय के इस आयोजन का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव करेंगे।

संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश द्वारा 18 मई से 

‘संग्रहालय मेला’ का आयोजन करेगा। इस आयोजन के माध्यम से जनसामान्य को इतिहास और सांस्कृतिक धरोहरों से रूबरू कराने का अभिनव प्रयास किया गया है।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव करेंगे। इस अवसर पर आयोजित वर्चुअल म्यूज़ियम केंद्र का शुभारंभ किया जाएगा। कार्यक्रम में विभाग के सचिव शिव शेखर शुक्ला भी मौजूद रहेंगे।

 

यह होगा वर्चुअल म्यूज़ियम केंद्र से फायदा

यह केंद्र आगंतुकों को एक अद्वितीय डिजिटल अनुभव प्रदान करेगा। इसमें पहली बार वर्चुअल म्यूज़ियम यात्रा की सुविधा उपलब्ध होगी।

 

यह भी होगा खास

कार्यक्रम के अंतर्गत एक छायाचित्र प्रदर्शनी ‘’भारत की सौर परंपरा” का आयोजन भी किया जाएगा। जिसमें भारत के सूर्य मंदिर एवं मूर्तियों के माध्यम से प्रस्तुत की जाएंगी। प्रदर्शनी सुबह 10:30 से शाम 5:30 बजे तक निशुल्क आमजन के लिए खुली रहेगी।

संग्रहालय मेला’ भी अद्भुत 

‘संग्रहालय मेला’ में विशेष प्रदर्शनियों, शैक्षणिक गतिविधियों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, बच्चों के लिए रचनात्मक कार्यशालाओं सहित विविध आयोजन होंगे। जो संग्रहालयों के प्रति जनसामान्य की रुचि और सहभागिता को सुदृढ़ करेंगे।

जल संवर्धन : एक संदेश वहां से भी जाए, जहां बह रहा नेकी का दरिया

  •  पूर्व में किया जा चुका है ऐसा प्रयोग
  •  नदियों के नाम पर रखे गए थे टेंट्स के नाम

खान आशु
भोपाल। जल है तो कल है… की धारणा के साथ मप्र सरकार जल गंगा संवर्धन अभियान चला रही है। नदियों का मायका है, की भावना के साथ प्रदेश की नदियों को सम्मान भी दिया जा रहा है। जल के समुचित उपयोग और इससे सबको फायदा पहुंचाने के प्रयास के साथ नदी जोड़ो जैसी कई योजनाएं प्रदेश में आकार ले रही हैं। ऐसे में मक्का मदीना में मौजूद अपने देश की संस्कृति, यहां के रिवाज और इसकी उपलब्धता के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करें। अपनी धरोहर को उस पाक सरजमीं पर याद करें और उनकी बेहतरी की दुआ के लिए हाथ उठाएं, ऐसे प्रयास और व्यवस्थाएं किए जाने की उम्मीद लगाई जाने लगी है। पूर्व में इस तरह की कोशिश और कवायद की जा चुकी है। तत्कालीन मप्र हज ऑफिसर सैयद शाकिर अली जाफरी ने इसको अंजाम दिया था। उन्होंने हज के दौरान मीना और मुजदलफा में बनने वाली टेंट सिटी को प्रदेश और देश की नदियों के नाम दिए थे।

करीब चार साल पहले हज सफर के दौरान मप्र हज कमेटी की तरफ से एक अनोखा प्रयोग किया गया था। तत्कालीन हज ऑफिसर सैयद शाकिर अली जाफरी ने इसकी कवायद की थी। इस दौरान कोसों दूर पहुंचे भारतीय हाजियों को अपने देश की संस्कृति और पहचान के दीदार मीना की टेंट सिटी में देखने को मिले थे। यहां ठहरने के लिए बनाए गए खेमों को अपने देश की प्रसिद्ध और धार्मिक महत्व रखने वाली नदि‌यों गोदावरी और कावेरी का नाम दिया गया था। गौरतलब है कि हज के दौरान पांच दिन के अरकान पूरे करने के लिए हाजी इन खेमों में ही रुकते हैं।


गौरतलब है कि हज के अहम अरकानों में शामिल मीना और अराफात में पहुंचकर जरूरी क्रियाएं पूरी करने का खास महत्व है। इस्लामी नजरिये से इनके बिना हज अरकान पूरे नहीं माने जाते हैं। इस्लाम के इस अहम सफर के दौरान भारतीय आस्थाओं का प्रतीक मानी जाने वाली नदियों के नामों को शामिल किए जाने का प्रयोग मप्र की तरफ से किया जा चुका है। लेकिन इस सिलसिले को अगले सालों में गति नहीं मिल पाई।

यह बन सकती है दलील
संस्कृत के एक श्लोक का अर्थ है कि उपर्युक्त सभी जल से परिपूर्ण नदियां, समुद्र सहित मेरा कल्याण करें। हज के दौरान की जाने वाली क्रियाएं और उपक्रम भी शुद्धिकरण और कल्याण की मंशा के साथ ही किए जाते हैं। ऐसे में इस पवित्र सफर के दौरान अपने देश की परंपराओं को साथ जोड़कर कोई काम किया जाए तो इससे हमारी संस्कृक्ति और धार्मिक आस्थाओं का समागम भी बना रहेगा।

इस बार इसलिए जरूरी
मप्र सरकार ने प्रदेश में जल गंगा संवर्धन अभियान की शुरुआत की है। 30 मार्च से शुरू हुआ यह अभियान 30 जून तक जारी रहेगा। इस दौरान जल की आवश्यकता और इसके संरक्षण का महत्व लोगों को समझाया जा रहा है। सरकारी तौर पर गैर सरकारी संस्थाओं के अलावा आमजन का इससे जुड़ाव बनाया गया है। हज सफर के बीच मुख्य अरकान भी जून माह में ही होने वाले हैं। ऐसे में मक्का मदीना की पाक सरजमीं से पानी बचाने को लेकर बेहतर संदेश दिया जा सकता है।

रहता है सरकारी अंश शामिल
प्रदेश से करीब 8 हजार से ज्यादा अकीदतमंद इस साल हज सफर पर जाएंगे। इनकी देखरेख, मार्गदर्शन और सुविधाओं के लिए प्रदेश सरकार ने खादिम उल हुज्जाज भी भेजे हैं। इन सभी का खर्च और अन्य व्यवस्थाएं प्रदेश हज कमेटी के सालाना बजट और सरकारी खजाने से होती हैं। ऐसे में मप्र सरकार अपने इन कर्मचारियों को अपने एक अहम अभियान का हिस्सा बना सकती है।

इनका कहना
हज के दौरान प्रदेश और देश की संस्कृति एवं परंपराओं से जोड़ने के प्रयास किए गए थे। नदियों के नाम पर स्थापित की गई टेंट सिटी को देशभर में सराहा और पसंद किया गया था। जल गंगा संवर्धन अभियान के दौर में इस साल भी ऐसा प्रयोग किया जाए तो अच्छे परिणाम लिए जा सकते हैं।
सैयद शाकिर अली जाफरी
पूर्व सीईओ,
मप्र राज्य हज कमेटी एवं पूर्व स्टेट हज ऑफिसर
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भोपाल रेप केस : कौम से बाहर किए जाएंगे गुनाहगार

* उलेमा ने कहा, ऐसे लोग हमारे नहीं हो सकते
* बनेंगी टोलियां, करेगी निगरानी

खान आशु
भोपाल। राजधानी भोपाल को शर्मसार करने वाले रेप कांड के बाद अब उलेमा ने सख्त फैसला लिया है। उलेमा ने मजहब ए इस्लाम को बदनाम करने वाले मामले से जुड़े गुनाहगारों को कौम से बेदखल करने का फैसला लिया है। इनका कहना है कि इस्लाम को मानने वाला कुरआन की सिखाई बातों पर अमल करता है, जबकि इन गुनाहगारों के क्रियाकलाप इस्लाम ही नहीं किसी भी मजहब की सीख नहीं हो सकती। उलेमा ने भोपाल रेप केस के सभी आरोपियों, उनके सहयोगियों और इन्हें संरक्षण देने वाले हर इंसान को इस्लाम के बाहर का करार दिया है।
राजधानी भोपाल के उलेमा ने कहा कि इस्लाम का तानाबाना आसमानी किताब कुरआन से जुड़ा है। यह किताब औरत की इज्जत, उसकी हिफाजत, उसके लिए अच्छे और बेहतर ख्याल रखने का हुक्म देती है। कुरआन ने किसी गैर मेहरम (जिससे कोई शरई रिश्ता न हो) की तरफ देखना भी गुनाह करार दिया है। ऐसी किसी महिला को देखना, बात करना या उससे कोई ताल्लुक बनाना जीना एक बड़ा गुनाह करार दिया गया है। अल्लाह ऐसे गुनाहगार को कभी माफ नहीं करता।
उलेमा ने कहा कि भोपाल में हुआ मामला न सिर्फ शहर और सूबे के साथ देश को शर्मसार करने वाला है, बल्कि इसने मजहब ए इस्लाम को भी नजरें झुकाने के हालात बना दिए हैं। उन्होंने कहा कि किसी एक इंसान की वजह से पूरी कौम को नफरत की नजर से देखा जा रहा है। इनके लिए होने वाले किसी फैसले या मिलने वाली हर सख्त सजा की पूरा मुस्लिम समुदाय पैरवी कर रहा है। उन्होंने कहा कि कुरआन, हदीस और इस्लाम के खिलाफ काम करने वाला कोई भी व्यक्ति हमारे बीच का नहीं हो सकता। उलेमा ने इस मामले के सभी गुनाहगारों को कौम से बेदखल करने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि इन गुनाहगारों का अब से मजहब ए इस्लाम से कोई संबंध नहीं रहेगा। यह लोग न हमारी मस्जिदों में दाखिल हो सकेंगे और न ही इन लोगों से शादी, ब्याह या अन्य किसी तरह के ताल्लुक भी मुस्लिम समुदाय रखेगा।

मांगी सख्त सजा
शहर के उलेमा ने भोपाल रेप केस के सभी आरोपियों के लिए सख्त सजा की मांग की है। उन्होंने कहा कि सामने दिखाई देने वाले गुनाहगारों के साथ वह लोग भी कसूरवार हैं, जो इन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर रहे हैं या करते रहे हैं। सियासी और बहुल का संरक्षण भी इस सजा का ही हकदार है। उन्होंने कहा कि इस मामले में हिन्दू मुस्लिम या सियासी घालमेल करने की बजाए पूरे शहर और सूबे को मिलकर इन सभी घृणित लोगों के लिए सजा की मांग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कानूनी दायरा न हो तो ऐसे लोगों को सार्वजनिक सजा दी जाना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों का दोहराव न हो सके।

निकाहख्वाह को ताकीद
उलेमा ने कहा कि हमारे प्रदेश में एक कानून अमल में है। जिसके मुताबिक दो अलग धर्मों के लड़के लड़कियों के बीच रिश्ता नहीं हो सकता। उन्होंने प्रदेश के सभी निकाह ख्वाह को ताकीद की है कि ऐसे किसी भी निकाह से बचें। इस तरह की शिकायत पाए जाने पर ऐसे निकाह ख्वाह के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। उनको भविष्य में किसी निकाह की तकमील करने का अधिकार भी नहीं रहेगा। शहर के उलेमा ने हिन्दू सम्प्रदाय से भी गुजारिश की है कि इस तरह की विवादित शादियों को मंदिर या किसी संस्था में न होने दिया जाए।

बनेंगी टोलियां, रखेंगी नजर
शहर के उलेमा ने समाज में वैमनस्यता फैलाने वाले युगलों पर निगरानी रखने के लिए पूरे प्रदेश में टीमें गठित करने का ऐलान किया है। यह टीमें सार्वजनिक स्थानों, स्कूल कॉलेज, वर्किंग प्लेस या होटल, ढाबों, रिजॉर्ट, रेस्टोरेंट पर साथ दिखाई देने वाले लड़का लड़कियों पर निगरानी रखेंगी। ऐसे जोड़े मिलने पर तत्काल इनके परिवार और संबंधित थाने पर सूचित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अलग अलग धर्मों के लड़के लड़कियों का इस तरह साथ घूमना समाज में विकट हालत बना रहा है। इसको रोकने के लिए सभी को अपने परिवार में भी निगरानी रखने और बेहतर शिक्षा देने की जरूरत है।
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