खान आशु
भोपाल। राजधानी भोपाल में संस्कृति और साहित्य के कई रंग एक साथ बिखेरता एक आयोजन शनिवार को शुरू हुआ। मप्र उर्दू अकादमी के तीन दिवसीय जश्न ए उर्दू में पिरोई गई कड़ियों के साक्षी बनने के लिए देश दुनिया के साहित्यकार, फनकार, कलमकार और शायर पहुंचने वाले हैं। शनिवार को हुई जश्न की शुरुआत के पहले दिन कई आयोजन के साथ ऑल इंडिया मुशायरा भी हुआ।
मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा पर आधारित तीन दिवसीय जश्ने उर्दू शनिवार को गौहर महल भोपाल में प्रारंभ हुआ। आयोजन की शुरुआत करते हुए उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने कहा कि हर वर्ष के समान इस वर्ष भी उर्दू अकादमी द्वारा एक उद्देश्यपूर्ण आयोजन की रूपरेखा तैयार की गई है। यह आयोजन उर्दू अकादमी के लिए एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जिससे अकादमी न केवल उर्दू भाषा और साहित्य को बढ़ावा दे सकेगी, बल्कि इसे सांस्कृतिक एकता और वैश्विक भाईचारे के संदेश का और अधिक सशक्त माध्यम भी बना सकेगी। यह हमारा “वसुधैव कुटुंबकम” के दर्शन को उर्दू के माध्यम से वैश्विक स्तर पर फैलाने का एक सशक्त आधार तैयार करने का प्रयास है।

ऐसा रहा पहला दिन
प्रथम सत्र में उर्दू गान एवं वसुधैव कुटुंबकम गीत उमेश तरकसवार और उनके समूह द्वारा प्रस्तुत कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। तत्पश्चात दूसरे सत्र में साहित्यिक बैतबाज़ी (अंत्याक्षरी) आयोजित हुई, जिसमें विद्यालयीन और महाविद्यालयीन छात्र छात्राओं द्वारा भाग लिया गया। प्रतियोगिता में क्रमशः टीम शैरी भोपाली प्रथम, टीम हसरत मोहानी द्वितीय एवं टीम जगन्नाथ आज़ाद तृतीय रहे। विजेताओं को आयोजन के समापन अवसर पर पुरस्कार और प्रमाण पत्रों से सम्मानित किया जाएगा। इस प्रतियोगिता के निर्णायक भोपाल के वरिष्ठ शायर फ़ारूक़ अंजुम और वरिष्ठ शायरा ख़ालिदा सिद्दीक़ थे। तीसरे सत्र में भोपाल की प्राचीन लोक परंपरा पर आधारित चारबैत आयोजित हुई। इसके अंतर्गत भोपाल के वरिष्ठ चारबैत पार्टियों अंजुमन ए गुलिस्तान ए चारबैत, बज़्मे शाहिद चारबैत के साथ भोपाल की महिला चारबैत कलाकारों की प्रस्तुति हुई। सभी ने उत्कृष्ट साहित्यिक कलाम पेश किए और ख़ूब वाहवाही लूटी। इसके सत्र में “फ़िल्म, थिएटर, टेलीविजन और उर्दू का सामंजस्य और वसुधैव कुटुंबकम” विषय पर संवाद हुआ। जिसमें सिने जगत थिएटर और टेलीविजन से जुड़ी मशहूर हस्तियों, राजीव वर्मा, शाहबाज़ खान मुंबई, सलीम आरिफ़ मुंबई और लुबना सलीम से प्रख्यात शायर व उद्घोषक अज़हर इक़बाल ने बातचीत की। इसके अंतर्गत प्रसिद्ध अभिनेता राजीव वर्मा ने कहा कि उर्दू भाषा “वसुधैव कुटुंबकम” जैसे भारतीय दर्शन को विश्व मे आम करने हेतु एक आदर्श माध्यम है। क्योंकि विश्व के लगभग सभी देशों में उर्दू बोली, पढ़ी और समझी जाती है। प्रख्यात अभिनेता शाहबाज़ ख़ान ने कहा कि फिल्म, थिएटर और डिजिटल मीडिया के माध्यम से उर्दू और इसके मानवतावादी संदेश को अधिक से अधिक प्रचारित किया जा सकता है। इस हेतु फिल्में बनती रही हैं अब इसकी और अधिक आवश्यकता है क्योंकि वैश्विकता के इस युग मे हम अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं। इस दौरान सलीम आरिफ़ ने कहा कि विशेष रूप से हमारी चिंताओं में युवा पीढ़ी शामिल होनी चाहिए। आज ऐसी फिल्मों के निर्माण की ज़रूरत है जो युवा पीढ़ी को वैश्विक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन को समझा सके। उन्होंने इस मौक़े पर ये भी कहा कि बच्चे पहले बुज़ुर्गो के पास जाते थे क्योंकि वे ज्ञान देते थे अब बच्चे इसलिए बुज़ुर्गो के पास नहीं जाते क्योंकि वे ज्ञान देते हैं। उसके बाद इक़बाल मसूद द्वारा पूरे तीन दिन चलने वाले इस आयोजन की रूपरेखा, स्वरूप और इसके विषय के बारे में वक्तव्य प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि मानवीय इतिहास की सुब्ह के साथ ही भारत में ज्ञान एवं सभ्यता का उजाला फैलना शुरू हो गया था और आज दस, पंद्रह हज़ार साल गूज़र जाने के बावजूद हमारे सनातन विचार, बुद्धिमत्ता जीवित है और इस सदियों पुराने विचार का निचोड़ एक वाक्य में सिमट आया है “वसुधैव कुटुम्बकम” ये एक रौशन लकीर की तरह पूरी दुनिया को राह दिखा रहा है।
वसुधैव कुटुम्बकम के वाक्य का अनुवाद न तो वैश्विक से हो सकता है और ना ही आलमियत इसका का हक़ अदा कर सकता है और न ग्लोबल विलेज इसका प्रतिनिधि है कि वो एक परिवार के प्रेम, भाईचारे से वंचित है, वास्तव में ये शक्ति, शांति, प्रीत की ताक़त है जो हम आज भी अपने सनातन विचार एवं सभ्यता के साथ ज़िन्दा हैं, सर उठा उठाकर भारत के अभिमान एवं ज्ञान से सरशार हैं उर्दू इसी प्रीत एवं ज्ञान का निशान है जो संस्कृत का अंतिम आधुनिक रूप है जिसमें संस्कृत की सुन्दरता, हिन्दी की मासूमियत है जो भारत की मिट्टी की तरह उपयुक्त है।

सजी मुशायरा महफिल
कार्यक्रम के अंतिम चरण में अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा सम्पन्न हुआ। जिसकी अध्यक्षता भोपाल के उस्ताद शायर ज़फ़र सहबाई ने की। मुशायरे का संचालन शकील जमाली द्वारा किया गया। मुशायरे में नामवर शायरों ने अपने कलाम पेश किए।

ज़फ़र सहबाई
बदन को रूह से कैसे जुदा किया जाये
वतन लिबास नहीं है बदल लिया जाये
राजेश रेड्डी
शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
इक़बाल अशहर
यही जुनून यही एक ख़्वाब मेरा है
वहां चराग़ जला दूं जहां अंधेरा है
मदनमोहन दानिश
नहीं छोड़ा पुरानेपन को अपने
इसी से फिर नया होना था मुझको
शकील जमाली
रास आ जाती है तन्हाई भी
एक दो रोज़ बुरा लगता है
दीप्ति मिश्र
शब्द नहीं अहसास लिखा है
जो था मेरे पास लिखा है
भला-बुरा अब दुनिया जाने
मैंने तो बिंदास लिखा है
डॉ परवीन कैफ़
काबा ए दिल में ढूँढना मुझको
मैं मिलूंगी तवाफ़ करती हुई
अज़हर इक़बाल
जाने वो बच्चे कहाँ किन रास्तों पर खो गए
जो बढ़े बूढ़ों को जाते थे नमन करते हुए
बद्र वास्ती
हम इनसां हैं तो फिर ऐसा मिज़ाज अच्छा नहीं होता
मुहब्बत से जो ख़ाली हो समाज अच्छा नहीं होता।।
सालिम सलीम
वो मिलने आया मगर अपने ही ख़याल में गुम
मैं सारी रात रहा नश्शाए मलाल में गुम
सैयद सरोश आसिफ़
उसके हाथ में ग़ुब्बारे थे , फिर भी बच्चा गुमसुम था
वो ग़ुब्बारे बेच रहा हो , ऐसा भी हो सकता है
रंग यह भी बिखरे
उपरोक्त के अतिरिक्त एक समानांतर मंच पर 2 बजे से 5 बजे तक साहित्यिक ओपन माइक, युवाओं के समूह “छतनारा” के सहयोग से आयोजित हुआ। इस खुले मंच के माध्यम से भी शायरी, गायन, एवं कहानी के क्षेत्र में कई नई प्रतिभाओं ने अपनी प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर आयोजित पुस्तक मेला भी लोगो के आकर्षण का केंद्र बना रहा और बड़ी संख्या में पुस्तक प्रेमी पुस्तकें ख़रीदते हुए देखे गए।अंत में आभार प्रदर्शन मुमताज़ ख़ान ने किया।
5 जनवरी 2025 को आयोजित होने वाले कार्यक्रम
प्रथम सत्र दोपहर 2:30 बजे- कथा साहित्य का सार्वभौमिक संदेश और वसुधैव कुटुंबकम
वक्ता – डॉ अली अब्बास उम्मीद भोपाल, अबरार मुजीब जमशेदपुर, इशरत नाहीद लखनऊ, स्तुति अग्रवाल सिरोंज
द्वितीय सत्र – शाम 4 बजे प्रादेशिक मुशायरा
तृतीय सत्र – शाम 7:30 बजे सांगीतिक सभा सलीम अल्लाहवाले भोपाल
क़व्वाली आफ़ताब क़ादरी इंदौर




